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​सहकारी बैंकों (DCCBs)में ‘भ्रष्टाचार का तंत्र’: विधानसभा में खुला राज, पांच साल में करोड़ों का गबन 

सार 

​राजस्थान के केंद्रीय सहकारी बैंकों में पिछले पाँच वर्षों में करोड़ों के गबन का खुलासा हुआ है। फर्जी एफडीआर और आईडी दुरुपयोग जैसे मामलों ने वित्तीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालाँकि विभाग ने बर्खास्तगी और वसूली की कार्रवाई की है, लेकिन कानूनी बाधाओं और ढीली निगरानी के कारण सिस्टम में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

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विस्तार 

जयपुर। । डिजिटल डेस्क। 5 जुलाई । राजस्थान के केन्द्रीय सहकारी बैंकों (DCCBs) में आम जनता की गाढ़ी कमाई कितनी सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब विधानसभा में मिले सहकारी आंकड़ों ने हिलाकर रख दिया है। विधायक चन्द्रभान सिंह चौहान के सवाल पर सहकारिता विभाग द्वारा लिखित मे पेश किए गए दस्तावेजों ने इन बैंकों में व्याप्त भ्रष्टाचार और गहरी अनियमितताओं की एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले पांच सालों में फर्जी एफडीआर (FDR) से लेकर आईडी के दुरुपयोग तक—गबन के ऐसे किस्से सामने आए हैं जो सहकारी तंत्र की साख पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं सहकारिता विभाग का कहना है कि दोषी बख्शे नहीं जा रहे हैं। कई मामलों में बर्खास्तगी की गई है, तो कई में रिटायरमेंट के परिलाभ (Retirement Benefits) जब्त किए गए हैं। धारा 57 के तहत वसूली के आदेश जारी हो रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि न्यायालयों से मिलने वाले ‘स्टे ऑर्डर’ ने सरकारी तंत्र की गति धीमी कर दी है।

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फर्जीवाड़ा: कहीं एफडीआर का खेल, तो कहीं आईडी का दुरुपयोग

​सहकारी सोसाइटी अधिनियम 2001 की धारा 55 और 57 के तहत हुई जांचों में वित्तीय घोटालों का जो खुलासा हुआ है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। इन बैंकों में गबन के तरीके भी बेहद शातिर रहे हैं:

  • ​भरतपुर का ‘बड़ा खेल’: भरतपुर केन्द्रीय सहकारी बैंक में जांच के दौरान 26.14 करोड़ रुपये की फर्जी एफडीआर बनाने का चौंकाने वाला खुलासा हुआ। साथ ही 1.09 करोड़ रुपये का अनियमित ब्याज आहरण अलग से किया गया।
  • ​जमवारामगढ़ में तकनीक का गलत इस्तेमाल: यहाँ एक कम्प्यूटरकर्मी ने बैंक की मर्यादा को ताक पर रखते हुए शाखा प्रबंधक और बैंकिंग सहायक की गोपनीय आईडी का ही दुरुपयोग कर 27.29 लाख रुपये का गबन कर डाला। कानूनी दांव-पेच और स्टे ऑर्डर के कारण फिलहाल वसूली की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में है।
  • ​चित्तौड़गढ़ में ताबड़तोड़ बर्खास्तगी: रावतभाटा शाखा में संदिग्ध एनईएफटी (NEFT) और आरटीजीएस (RTGS) के जरिए 122.96 लाख रुपये के खेल में बैंक प्रबंधक और बैंकिंग सहायक तक को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। भदेसर शाखा में भी 13.01 लाख रुपये के गबन में प्रबंधक पर गाज गिरी।

​विशेषज्ञों की राय: ‘सुधार की दरकार’

​वित्तीय जानकारों का मानना है कि केवल बर्खास्तगी या वसूली काफी नहीं है। इतने बड़े पैमाने पर हो रहे घोटाले बताते हैं कि बैंकों के आंतरिक नियंत्रण (Internal Control) और पर्यवेक्षण प्रणाली (Supervision) में भारी खामियां हैं। जब तक शाखाओं के दैनिक कामकाज में डिजिटल सुरक्षा और उच्च-स्तरीय मॉनिटरिंग सख्त नहीं होगी, तब तक आम आदमी का सहकारी बैंकों पर भरोसा कायम करना मुश्किल होगा।

एक्सपर्ट व्यू:झ

सहकारी जवाब ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि सहकारी बैंकों( DCCBs )का सिस्टम ‘बीमार’ है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब करोड़ों का गबन हो रहा था, तब विभाग का ‘सुपरविजन’ कहां था? क्या केवल कर्मचारियों को बर्खास्त करना ही समाधान है, या सिस्टम में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है?

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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