सार
Jodhpur : राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तदर्थ (ad hoc) कर्मचारी को पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने ऋण पर्यवेक्षक की याचिका खारिज करते हुए पदस्थापना को प्रशासनिक विवेक बताया।

विस्तार
जोधपुर । डिजिटल डेस्क । 19 अप्रैल । राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी पद पर तदर्थ (ad hoc) रूप से कार्यरत कर्मचारी उस पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं जता सकता । न्यायमूर्ति फरजंद अली की पीठ ने पवन कुमार द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी । मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता पवन कुमार को फरवरी 2024 में श्रीगंगानगर केंद्रीय सहकारी बैंक में तदर्थ आधार पर ऋण पर्यवेक्षक (Loan Supervisor) के पद पर नियुक्त किया गया था । मार्च 2026 में बैंक ने एक आदेश जारी कर उनके स्थान पर संदीप कुमार को इस पद का कार्यभार सौंप दिया । याचिकाकर्ता ने इस बदलाव को मनमाना और सेवा नियमों के विरुद्ध बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी ।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पदस्थापना, स्थानांतरण और कर्तव्यों का आवंटन पूरी तरह से प्रशासनिक विवेक का हिस्सा है । नियोक्ता के पास यह पूर्ण अधिकार है कि वह संस्थागत आवश्यकताओं और कार्य कुशलता को देखते हुए यह तय करे कि किस कर्मचारी को क्या जिम्मेदारी दी जानी चाहिए । उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक सेवक किसी विशिष्ट पद या प्रभार पर बने रहने के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे प्रभार अस्थायी और प्रशासनिक संतुलन का परिणाम होते हैं ।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि याचिकाकर्ता के पदनाम, वेतनमान या मूल नियुक्ति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है, इसलिए इस प्रशासनिक फेरबदल से पहले उन्हें नोटिस देने या सुनने की आवश्यकता नहीं थी । अंततः, अदालत ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए उसे और साथ ही स्थगन आवेदन को भी खारिज कर दिया ।


