Home स्‍पेशल सहकारिता विभाग का सुशासन : समस्याओं से मुंह मोड़ा, सीधे FIR का चाबुक छोड़ा..!

सहकारिता विभाग का सुशासन : समस्याओं से मुंह मोड़ा, सीधे FIR का चाबुक छोड़ा..!

​सार 

Jaipur : पैक्स कंप्यूटरीकरण के तहत सहयोग न करने वाले व्यवस्थापकों पर सीधे FIR दर्ज करने के निर्देश…. कर्मचारी यूनियन और विशेषज्ञों ने इसे अव्यावहारिक और तानाशाही बताया, क्योंकि राज्य में पैक्स में व्यवस्थापकों की भारी कमी है, कर्मचारियों को प्रशिक्षण नहीं मिला है और एक व्यवस्थापक दो से तीन पैक्स का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहा है ।

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जयपुर। डिजिटल डेस्क | 6 जून | राजस्थान का सहकारिता विभाग इन दिनों पैक्स कम्प्यूटराइजेशन के नाम पर चल रहे एक ऐसे ‘डिजिटल प्रयोग’ को लेकर चर्चा में है, जिसे विशेषज्ञ सहकारी आंदोलन की नींव को कमजोर करने वाला मान रहे हैं। हाल ही में राजफैड प्रबंध निदेशक की अध्यक्षता में आयोजित हुई पैक्स कम्प्यूटराईजेशन परियोजना की संभागवार समीक्षा बैठक के बाद सहकारिता विभाग के शासन सचिव एवं प्रशासक अपेक्स बैंक द्वारा जारी आधिकारिक कार्यवाही विवरण ने प्रदेश भर के पैक्स व्यवस्थापकों में हड़कंप मचा दिया है। शासन सचिव स्तर से जारी इस दस्तावेज में पैक्स व्यवस्थापकों के लिए जारी किए गए सख्त निर्देश और वक्तव्य प्रदेश भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं | शासन सचिव एवं प्रशासक अपेक्स बैंक स्तर से स्पष्ट किया गया है कि ई-पैक्स/डायनामिक डे-एण्ड के लिए ऑन-सिस्टम ऑडिट की अनिवार्यता नहीं है, निर्देशों में कहा गया है कि ऑन-सिस्टम ऑडिट का इंतजार किये बिना नियमित रूप से डे-एण्ड करते हुए 10 जून से पूर्व समस्त पैक्स को ई-पैक्स में परिवर्तित कराया जावे। इसके साथ ही इस वक्तव्य में यह भी कड़ा निर्देश दिया गया है कि यदि कोई व्यवस्थापक इस कार्य में सहयोग नहीं करता है, तो उसे मात्र 2 दिवस का समय दिया जाए और तत्पश्चात् सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज करवाई जाए”

यह सख्त निर्देश ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य के लगभग 8,000 में से 4,000 पैक्स-लैम्प्स में व्यवस्थापकों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। विभाग की कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्टाफ की भारी कमी के बावजूद, अधिकांश व्यवस्थापकों पर पहले ही सीसीबी (CCB) शाखाओं में कार्यवाहक ऋण पर्यवेक्षक की अतिरिक्त जिम्मेदारी का बोझ लाद दिया गया है। जानकारों का कहना है कि जहां संस्थान का बुनियादी ढांचा ही चरमराया हुआ है, वहां सॉफ्टवेयर की जबरिया घुसपैठ और समीक्षा बैठक के बाद सीधे एफआईआर जैसे कड़े निर्देश डिजिटल क्रांति के बजाय नौकरशाही की हठधर्मिता का प्रमाण अधिक लग रहे हैं।

व्यवस्थापकों की यूनियन ने इस पूरी प्रक्रिया को अव्यावहारिक करार दिया है। यूनियन का आरोप है कि कम्प्यूटराइजेशन के लिए न तो कोई उचित प्रशिक्षण दिया गया और न ही डेटा फीडिंग के लिए कुशल कार्मिकों का चयन हुआ। आरोप यह भी है कि अनुभवहीन वेंडर्स के अकुशल कार्मिकों के माध्यम से आधी-अधूरी योजना थोपी जा रही है और प्रशिक्षण तथा हार्डवेयर खरीद के नाम पर बड़ी राशि का बंदरबांट किया जा रहा है।

सुविधाओं के नाम पर ‘आउटसाइडर’, काम के बोझ में ‘सरकारी’

विभाग के इस रवैये की पोल विधानसभा में दिए गए सरकारी जवाबों से भी खुलती है। विधायक प्रशांत शर्मा के तारांकित प्रश्न के उत्तर में विभाग ने स्पष्ट किया है कि पैक्स व्यवस्थापक न तो सरकारी कर्मचारी हैं और न ही उन्हें राज्य सेवा में शामिल करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन है। स्थिति यह है कि सेवा-शर्तों के मामले में इन्हें ‘आउटसाइडर’ मानकर सुविधाओं से वंचित रखा गया है, लेकिन काम के दबाव और एफआईआर जैसी धमकियों के मामले में उनसे सरकारी मशीनरी जैसी अपेक्षाएं की जा रही हैं। विभाग की हठधर्मिता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की अधिकांश पैक्स-लैम्प्स में तैनात व्यवस्थापकों को पिछले दो साल से नियमित मासिक वेतन तक नहीं मिला है। एक ओर आर्थिक तंगी का दंश झेल रहे ये कर्मी हैं, तो दूसरी ओर एक-एक व्यवस्थापक के कंधों पर तीन से चार समितियों का अतिरिक्त कार्यभार है। खाली तिजोरी और ओवरलोडिंग के बोझ तले दबे इन कार्मिकों से डिजिटल चमत्कार की उम्मीद करना नौकरशाही की संवेदनहीनता का चरम है।

धरातल की हकीकत से मुंह मोड़ना

सहकारिता के जानकारों का मानना है कि शासन सचिव स्तर पर बैठे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को विभाग के अधीनस्थ अधिकारियों और तकनीकी एजेंसियों द्वारा धरातल की सही तस्वीर और वास्तविक समस्याओं से अवगत कराया जाना चाहिए था। जिम्मेदारी अधीनस्थ अधिकारियों की थी कि वे शासन सचिव के समक्ष तकनीकी खामियों और पैक्स व्यवस्थापकों की भारी कमी जैसी बुनियादी बाधाओं को रखते, ताकि उनका उचित निस्तारण हो पाता। लेकिन इसके विपरीत, जमीनी समस्याओं को छिपाकर केवल आंकड़ों की बाजीगरी दिखाई गई, जिसका नतीजा यह हुआ कि शीर्ष स्तर से सीधे एफआईआर जैसी सख्त चेतावनियां जारी हो रही हैंसवाल यह है कि क्या राजस्थान की सहकारिता व्यवस्था अब ‘समस्याओं के समाधान’ पर नहीं, बल्कि ‘खौफ’ के दम पर आगे बढ़ेगी? 

सूरजभानसिंह आमेरा, सहकार नेता

“पैक्स कम्प्यूटराइजेशन को सफल बनाने के लिए विभाग को धरातल की कड़वी हकीकत को समझना होगा। वर्तमान में पैक्स स्तर पर व्यवस्थापकों की भारी कमी है और एक ही कर्मी पर कई दूरस्थ समितियों का अतिरिक्त कार्यभार है। इसके अलावा तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव, खराब कनेक्टिविटी और नियमित वेतन न मिलना प्रमुख समस्याएं हैं। इन वाजिब परेशानियों को दूर किए बिना डिजिटल क्रांति संभव नहीं है। अपने ही मातहत कर्मचारियों को सुधार के नाम पर सीधे FIR का डर दिखाना और तनाव पैदा करना सुशासन के सिद्धांतों के खिलाफ है। विभाग को इस पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए।”

-सूरजभानसिंह आमेरा, सहकार नेता

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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