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सहकारिता के तंत्र को दीमक की तरह चाट रहा ‘असंतुलन’, जाँच की फाइलों पर राजनीतिक रसूख से गिरा पर्दा

 पैक्स व बैंकों के बीच वित्तीय खाई से सहकार जगत की रीढ़ हुई जर्जर, निष्पक्ष जाँच हो तो करोड़ों की रिकवरी संभव…..?

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राजस्थान / सहकार जगत ग्राउंड रिपोर्ट, 26 अक्टूबर| राजस्थान के त्रिस्तरीय सहकारी ढाँचे की बुनियाद कही जाने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS) और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) के बीच गहराता ‘असंतुलन’ (Imbalance) अब सहकारी आंदोलन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुका है। केंद्रीय सहकारी बैंकों से समितियों द्वारा उठाया गया ऋण और समितियों के सदस्यों के विरुद्ध बकाया ऋण का यह ऋणात्मक अंतर केवल बही-खातों की गड़बड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के वित्तीय गोलमाल, आय से अधिक व्यय और प्रशासनिक लापरवाही का जीवंत दस्तावेज है।आधिकारिक रिपोर्टों और आंकड़ों के मुताबिक अब तक प्रदेश के 29 केंद्रीय सहकारी बैंकों से जुड़ी 7,029 पैक्स में से 1,804 समितियाँ गंभीर असंतुलन की चपेट में थीं। इन समितियों में कुल असंतुलन की राशि ₹68,574.57 लाख (लगभग ₹685.74 करोड़) के आंकड़े को पार कर चुकी है। जमीनी हकीकत यह है कि सहकार जगत की रीढ़ को बचाने के लिए एक दशक से लगातार संघर्षरत पैक्स-लैम्प्स कार्मिकों के संगठनात्मक नेतृत्वकर्ता नंदलाल वैष्णव ने इस असंतुलन के विरुद्ध सशक्त पैरवी की और शीर्ष स्तर तक आवाज उठाई।

सर्वे में खुली पोल, नए जिलों के बैंकों खोलने पर मंडराया संकट

राजस्थान में नए जिलों के गठन के बाद पृथक केंद्रीय सहकारी बैंकों की स्थापना के लिए कराए गए विभागीय सर्वे की रिपोर्ट ने सहकारी समितियों के वित्तीय स्वास्थ्य का कड़वा सच उजागर कर दिया है। सर्वे रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सीमांकन और नए बैंकों के बंटवारे के बीच असंतुलन की यह विसंगति नए बैंकों के गठन की संभावनाओं पर भी पानी फेर रही है।विभाग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, धौलपुर जिले में कार्यरत 92 पैक्स में से 57 समितियों में असंतुलन की राशि ₹1005.53 लाख पहुँच चुकी है। स्थिति यह है कि भरतपुर बैंक की धौलपुर स्थित सभी 4 शाखाएँ ₹166.94 लाख की हानि में हैं। इसी तरह डीग जिले की स्थिति और भी भयावह है, जहाँ कार्यरत 139 पैक्स में से 96 पैक्स असंतुलन की चपेट में हैं और असंतुलन का यह आंकड़ा ₹4438.19 लाख की चिंताजनक सीमा को छू रहा है। डीग क्षेत्र में एनपीए (NPA) भी ₹1055.52 लाख हो चुका है।अन्य जिलों का जायजा लें तो डीडवाना-कुचामन जिले की 181 में से 75 समितियों में ₹3548.35 लाख का असंतुलन और ₹3788.55 लाख का एनपीए दर्ज किया गया है, जिसे केवल काल्पनिक व्यवसाय विकास योजनाओं के भरोसे छोड़ने की बात कही जा रही है। खैरथल-तिजारा में 100 में से 21 समितियाँ ₹1150.19 लाख के असंतुलन से जूझ रही हैं। रिपोर्ट में साफ चेताया गया है कि असंतुलन के इस बोझ के चलते पृथक बैंकों की स्थापना के बाद भी नए बैंक और पैतृक बैंक दोनों ही आगामी वर्षों में लाभप्रद स्थिति में नहीं आ सकेंगे।

हालाँकि, सहकारिता विभाग और शीर्ष बैंक का रवैया हमेशा लीपापोती वाला ही रहा। राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (RSCB) में प्रबंध निदेशक पद पर तैनात रहे राज्य सहकारिता सेवा के वरिष्ठ अधिकारी भोमाराम ने इस बढ़ते वित्तीय असंतुलन की निष्पक्ष पड़ताल के लिए बकायदा एक जाँच कमेटी गठित की थी। परंतु जैसे ही जाँच की आंच बड़े प्रशासनिक व राजनीतिक सूरमाओं तक पहुँचने लगी, राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर असंतुलन को बढ़ावा देने वाले आकाओं ने उस अधिकारी का तुरंत तबादला करवा दिया और पड़ताल पर हमेशा के लिए पर्दा गिरा दिया।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आज भी इस बढ़ते असंतुलन की पारदर्शी और उच्चस्तरीय जाँच करवाई जाए, तो गलत वेतनमान निर्धारण, एरियर के अनियमित भुगतान और फर्जीवाड़े से बांटी गई करोड़ों रुपये की राशि की वसूली संभव है। इस वसूली से टूट चुका त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र पुनः वित्तीय सक्षमता से लबरेज नजर आ सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सहकारिता विभाग में ऐसी दिलेरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने का माद्दा दूर-दूर  तक नही  बचा है?

 दक्षिणी राजस्थान में भी वित्तीय घाव गहरे, राजसमंद व प्रतापगढ़ में बढ़ा आंकड़ा

मेवाड़ और वागड़ आंचल की सहकारिता व्यवस्था भी जिला बैंकों और पैक्स के बीच गहराते असंतुलन से अछूती नहीं है। उदयपुर केंद्रीय सहकारी बैंक से पृथक कर नए बैंक बनाने के प्रस्तावों के बीच जारी सर्वे में राजसमंद और प्रतापगढ़ जिलों में पैक्स स्तर पर भारी वित्तीय असंतुलन सामने आया है।राजसमंद जिले की सर्वे रिपोर्ट में विभागीय अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया है कि जिले की 147 समितियों में से 37 समितियों में कुल ₹1333.10 लाख का असंतुलन है। रिपोर्ट में इस राशि को अत्यधिक और गंभीर रूप से चिंताजनक माना गया है। इसके अतिरिक्त बैंक का वसूल योग्य ब्याज भी ₹388.89 लाख बकाया पड़ा है।प्रतापगढ़ जिले का हाल देखें तो उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और बांसवाड़ा बैंकों के अधीन आने वाली 158 पैक्स/लैम्प्स में से अकेले प्रतापगढ़ बैंक क्षेत्र की 122 समितियों में ही ₹2066.74 लाख का असंतुलन जमा हो चुका है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इसे प्रतिवर्ष वसूली अभियानों से दूर करना होगा।सहकारी दिग्गजों का कहना है कि यह असंतुलन अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि आय से अधिक खर्चों और अपात्रों को बांटे गए कर्ज की वजह से उपजा है। जब तक शीर्ष स्तर पर प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाकर रिकवरी की ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक कागज पर योजनाएँ बनाने से असंतुलन का यह वित्तीय घाव भरने वाला नहीं है।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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