देश में आवासयन सहित 1.41 लाख से अधिक सहकारी समितियां निष्क्रिय हैं, जबकि राजस्थान में भी 13 हजार से ज्यादा समितियां ताले में बंद हैं।
वित्तीय कुप्रबंधन के चलते देश की 2.50 लाख और राजस्थान की 9614 से अधिक कार्यशील समितियां भारी घाटे के दलदल में धंसी हैं।

नई दिल्ली / जयपुर | सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट | 23 अगस्त [प्रकाश वैष्णव] — सहकारिता का खोखला सच: कागजी दावों के मक्कड़जाल में फंसी देश और राजस्थान की सहकारी समितियां, लाखों इकाइयां घाटे और ताले की भेंट ……? देश भर में सहकारी आंदोलन की चमक कागजी दावों और चमकदार भाषणों के बीच किस तरह फीकी पड़ रही है, इसकी बानगी संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों से साफ उजागर होती है। राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस (एनसीडी) के अनुसार, देश में कुल 8,53,430 पंजीकृत सहकारी समितियां मौजूद हैं, जिनमें आवासयन (हाउसिंग) सहकारी समितियों की संख्या सबसे अधिक 1,95,411 है। लेकिन विडंबना यह है कि कागजों पर विज्ञापनों और बड़े दावों के जरिए मजबूत दिखने वाला यह ढांचा भीतर से बुरी तरह खोखला हो चुका है।
कुल 8.53 लाख समितियों में से लगभग 1.41 लाख समितियां पूरी तरह अक्रियाशील (निष्क्रिय) हो चुकी हैं, जबकि 49,177 समितियां परिसमापनाधीन (विघटन की कगार पर) हैं। बात अगर राजस्थान की करें, तो यहाँ भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं; राज्य में कुल 43,723 सहकारी समितियां हैं, जिनमें से 13,340 समितियां गैर-कार्यशील (निष्क्रिय) और 3,239 समितियां परिसमापन के दायरे में पड़ी हैं। इसके अलावा, राजस्थान की कार्यशील समितियों में भी 9,614 समितियां भारी घाटे के दलदल में धंसी हुई हैं, जो प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं।
वित्तीय मोर्चे पर राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति बेहद भयावह है। देश की 6.63 लाख कार्यशील समितियों में से करीब 2.50 लाख समितियां घाटे में दौड़ रही हैं। देश के कई राज्यों में वित्तीय कुप्रबंधन के चलते सहकारी समितियां फायदे की जगह सफेद हाथी साबित हो रही हैं, जहां घाटे का यह आंकड़ा सरकारी दावों के खोखलेपन पर सीधा सवालिया निशान खड़े करता है। महाराष्ट्र और केरल जैसे बड़े राज्यों में भी वित्तीय संकट और घाटे में चल रही समितियों की भारी तादाद इस बात का सबूत है कि नीतिगत नियंत्रण और प्रशासनिक कसावट की घोर कमी है। इसके अलावा, हजारों ऐसी समितियां हैं जिनकी वित्तीय जानकारी तक डेटाबेस में उपलब्ध नहीं है, जो पारदर्शिता पर बड़ा धब्बा है। सरकार भले ही प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के आधुनिकीकरण, बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम के तहत फंड बनाने और बहुउद्देशीय गतिविधियों के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर विफलता का यह अंबार सहकारिता क्षेत्र की बदहाली की चीखती हुई तस्वीर बयां कर रहा है। जब तक व्यवस्था में सख्त जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक इन कागजी सुधारों से हालात का सुधरना नामुमकिन है।
निष्क्रियता और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ीं लाखों समितियां, राजस्थान से लेकर देश तक पसरा सन्नाटा
देशभर में सहकारिता आंदोलन की पोल खोलते हुए आंकड़े सामने आए हैं, जिनके मुताबिक कागजों पर सक्रिय दिखने वाली व्यवस्था अंदर से किस कदर बीमार हो चुकी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में 1.41 लाख से अधिक सहकारी समितियां पूरी तरह से निष्क्रिय पड़ी हैं। इसके साथ ही, लगभग 49,177 समितियां ऐसी हैं जो परिसमापन के कगार पर पहुंच चुकी हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में भी यही बदहाली देखने को मिलती है, जहाँ 13,340 से अधिक समितियां ताले में बंद या निष्क्रिय हैं। आवासयन क्षेत्र में 1.95 लाख से ज्यादा समितियां होने के बावजूद आम जनता को इसका ठोस लाभ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि कुप्रबंधन और उचित देखरेख के अभाव में ये संस्थाएं केवल कागजी आंकड़े बनकर रह गई हैं। सरकार के तमाम पुनरुद्धार और पैकेज के दावे धरातल पर दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।
घाटे के दलदल में धंसी अर्थव्यवस्था: राजस्थान समेत देश भर की हजारों समितियां साबित हो रही हैं ‘सफेद हाथी’
लाखों कार्यशील सहकारी समितियों में से लगभग 2.50 लाख समितियां भारी घाटे के दलदल में धंसी हुई हैं, जो देश के आर्थिक ढांचे पर एक बड़ा बोझ बन चुकी हैं। अकेले राजस्थान में 9,614 कार्यशील समितियां घाटे में चल रही हैं, जो राज्य के सहकारिता ढांचे में व्याप्त गंभीर वित्तीय कुप्रबंधन को उजागर करता है। महाराष्ट्र, केरल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी घाटे में चल रही समितियों का यह जाल इस बात का साफ संकेत है कि वित्तीय अनुशासन पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। इसके ऊपर 56,000 से अधिक ऐसी समितियां हैं जिनकी कोई वित्तीय जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। जब तक इन घाटे में चल रही इकाइयों को पारदर्शी और सख्त निगरानी के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक सहकारिता के नाम पर हो रही धन की बर्बादी को रोक पाना असंभव होगा।


