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205 करोड़ के घाटे में चल रहे केंद्रीय सहकारी बैंकों पर सरकारी अफसरों के वेतन का बोझ, बिना जॉइनिंग और APO अवधि का भी भुगतान

सार 

Jaipur : सहकारिता विभाग के घाटे में चल रहे केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) के कोष से राजकीय अधिकारियों को नियम विरुद्ध वेतन दे रहा है। कर्मचारियों ने इस वित्तीय कदाचार के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई….!

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विस्तार 

जयपुर । डिजिटल डेस्क | 23 मई | प्रदेश में वित्तीय संकट से जूझ रहे केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) के संचित कोष से सहकारिता विभाग के अधिकारियों को वेतन भुगतान किए जाने का एक अत्यंत गंभीर मामला प्रकाश में आया है। विभागीय विरोधाभास की स्थिति यह है कि एक ओर जहां संचित हानि का हवाला देकर इन बैंकों के मूल कर्मचारियों का वेतन समझौता एवं अन्य न्यायोचित लाभ रोक दिए गए हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य प्रशासनिक (सहकारिता) सेवा के नवनियुक्त अधिकारियों को, जिन्होंने संबंधित सीसीबी में कार्यभार तक ग्रहण (जॉइन) नहीं किया है, उन्हें भी इन्हीं घाटे में चल रहे बैंकों से प्रति माह वेतन दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, जिन अधिकारियों को विभाग द्वारा ‘पदस्थापन की प्रतीक्षा में’ (APO) रखकर सचिवालय या रजिस्ट्रार कार्यालय में उपस्थिति देने हेतु निर्देशित किया जाता है, उन्हें भी उस अवधि का वेतन उन्हीं बैंकों से भुगताया जा रहा है, जहां वे पूर्व में पदस्थापित थे।

जब सहकारिता विभाग स्वयं राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के माध्यम से चयनित इन अभ्यर्थियों को राजकीय सेवा का अधिकारी मानता है, तो उनके पारिश्रमिक का भार विभागीय बजटीय प्रावधानों के बजाय स्वायत्त सहकारी संस्थाओं के कोष पर डालना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। विडंबना यह है कि इन अधिकारियों के वेतन आहरण के समय ‘लाभ-हानि’ की विधिक शर्तों को पूरी तरह शिथिल कर दिया जाता है, जबकि इन्हीं बैंकों के नियमित कर्मचारियों के एरियर और वेतन वृद्धि के समय इन्हीं शर्तों का अवरोध खड़ा कर दिया जाता है। विभाग द्वारा लाखों रुपये वेतन पाने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को APO रखकर, भारी वित्तीय विसंगति से जूझ रहे केंद्रीय सहकारी बैंकों के रिक्त पदों के विरुद्ध वेतन आहरण की निरंतर स्वीकृतियां जारी की जा रही हैं।

करोड़ों के घाटे में बैंक, फिर भी वेतन का बोझ

सहकारिता विभाग द्वारा जारी वित्तीय वर्ष 2024-25 के वार्षिक प्रतिवेदन (Annual Report) के अनुसार, प्रदेश के केंद्रीय सहकारी बैंक वर्तमान में लगभग 205 करोड़ रुपये की भारी-भरकम संचित वार्षिक हानि (घाटे) से ग्रसित हैं। इस दयनीय वित्तीय स्थिति के उपरांत भी विभाग ने समय-समय पर मनमाने आदेश जारी कर राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवाएं (संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा) के माध्यम से नवनियुक्त सहायक रजिस्ट्रारों को विभिन्न सीसीबी में ‘अतिरिक्त अधिशाषी अधिकारी’ जैसे रिक्त पदों पर प्रशासनिक रूप से समायोजित (दिखाकर) कर वहां से वेतन आहरण की अनुमति प्रदान की। इसी परिपाटी के अंतर्गत, पदस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे संयुक्त रजिस्ट्रार, उप रजिस्ट्रार और सहायक रजिस्ट्रार स्तर के उच्चाधिकारियों को भी बूंदी, भरतपुर और उदयपुर जैसे केंद्रीय सहकारी बैंकों के प्रबंध निदेशक (MD) एवं अतिरिक्त अधिशाषी अधिकारी के रिक्त कैडर पदों से निरंतर वेतन आहरित करने की विधिक स्वीकृतियां दी जाती रहीं।

घाटे में डूबी सहकारी संस्थाओं पर बढ़ा वित्तीय भार

सहकारिता विभाग द्वारा राजस्थान सहकारी सेवा 2023 बैच के 39 प्रशिक्षु अधिकारियों हेतु ‘राईसेम’ में हाल ही में आधारभूत पाठ्यक्रम आयोजित किया जा रहा है । अत्यंत विस्मयकारी तथ्य यह है कि प्रशिक्षणकाल के दौरान इन नवनियुक्त अधिकारियों का वेतन विभागीय बजटीय प्रावधानों के बजाय प्रदेश के विभिन्न केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) एवं प्राथमिक भूमि विकास बैंकों के रिक्त पदों से आहरित करने की विधिक स्वीकृति प्रदान की गई है । विभागीय आदेश के अनुक्रम में रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा मातहत अधिकारियों को मात्र 7 कार्यदिवस के भीतर इन प्रशिक्षुओं की एम्पलॉई आईडी सृजित कर वेतन भुगतान सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए गए हैं । एक ओर जहाँ प्रदेश की स्वायत्त सहकारी संस्थाएं और केंद्रीय सहकारी बैंक पूर्व से ही करोड़ों रुपये के संचित वित्तीय घाटे से त्रस्त हैं, वहीं दूसरी ओर धरातल पर कार्यभार ग्रहण किए बिना ही इन अधिकारियों के वेतन का भारी-भरकम आर्थिक बोझ इन कमर्शियल व स्वायत्त निकायों के संचित कोष पर अधिरोपित किया जा रहा है ।

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विधायक के प्रश्न पर विभाग का विरोधाभासी वक्तव्य 

इस संपूर्ण प्रकरण में विभाग का दोहरा नीतिगत चरित्र और प्रशासनिक अंतर्विरोध तब पूर्णतः सार्वजनिक हो गया, जब राजस्थान विधानसभा में विधायक चन्द्रभानसिंह चौहान द्वारा पूछे गए एक तारांकित प्रश्न के उत्तर में सहकारिता विभाग ने अपना लिखित वक्तव्य प्रस्तुत किया। विभाग द्वारा प्रस्तुत उत्तर का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर इस पूरे समायोजन में विधिक अनदेखी स्पष्ट परिलक्षित होती है। विभाग ने सदन के पटल पर लिखित रूप से यह स्वीकार किया है कि ‘केंद्रीय सहकारी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से लाइसेंस प्राप्त वाणिज्यिक (कमर्शियल) संस्थान हैं।’ इस आधिकारिक स्वीकारोक्ति के बाद अब सहकारिता के नीतिगत हलकों में यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि जब ये केंद्रीय सहकारी बैंक पूर्णतः स्वायत्त, व्यावसायिक एवं वाणिज्यिक निकाय हैं, जो आम जनता और कृषकों की जमा पूंजी तथा बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के नियमों पर संचालित होते हैं, तो राजकीय कैडर के इन अधिकारियों के पारिश्रमिक/वेतन का भारी-भरकम आर्थिक बोझ इन घाटे में डूबे संस्थानों पर किस नियम के अंतर्गत अधिरोपित किया जा रहा है?

विधायक के प्रश्न के उत्तर ने विभागीय उच्चाधिकारियों के उन तमाम प्रशासनिक तर्कों को ध्वस्त कर दिया है, जिसमें वे इस मनमाने समायोजन को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया निरूपित कर रहे थे। बैंकिंग विशेषज्ञों के मतानुसार, कमर्शियल बैंकों की पूंजी का उपयोग राजकीय अधिकारियों के वेतन प्रतिपूर्ति के लिए करना प्रत्यक्ष रूप से ‘वित्तीय कदाचार’ (Financial Malpractice) की श्रेणी में आता है।

खोला मोर्चा, उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग

इस गंभीर वित्तीय विसंगति और प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध ‘राजस्थान सहकारी कर्मचारी बैंक्स एसोसिएशन’ ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए व्यापक विरोध दर्ज कराया है। एसोसिएशन के प्रदेशाध्यक्ष रघुवीर शर्मा ने कहा कि जो बैंक पूर्व से ही 205 करोड़ रुपये के घाटे के कारण वित्तीय रूप से वेंटिलेटर पर हैं, उनके रिक्त कैडर पदों का अनैतिक उपयोग कर सरकारी अधिकारियों को उपकृत करना पूर्णतः गैर-कानूनी और सेवा नियमों के विपरीत है। एसोसिएशन ने राज्य सरकार के समक्ष प्रमुखता से यह मांग रखी है कि इस संपूर्ण वेतन आहरण प्रकरण और वित्तीय विसंगतियों की जांच हेतु एक स्वतंत्र, उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच समिति (High-Level Inquiry Committee) का गठन किया जाए। साथ ही, सीसीबी के संचित कोष से इन अधिकारियों को अब तक भुगतान की गई वेतन की संपूर्ण राशि को अविलंब राजकीय कोष (Government Treasury) से प्रतिपूरित (Reimburse) करवाकर पुनः बैंकों के खातों में स्थानांतरित किया जाए।

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मामला हाईकोर्ट ले जाने की तैयारी

इस गंभीर नीतिगत विसंगति को लेकर प्रदेश के सहकारी साख आंदोलन (Cooperative Credit Movement) से जुड़े हितधारकों में आक्रोश निरंतर व्याप्त है। जोधपुर खंड के सहकारी साख आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ सूत्रों ने दूरभाषा पर वार्ता के माध्यम से विभाग की इस दमनकारी और शोषक नीति पर तीखा प्रहार किया है। सूत्रों के अनुसार, वे इस वित्तीय अनियमितता की तह तक जाने के लिए सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नाबार्ड (NABARD) से आवश्यक तकनीकी और विधिक साक्ष्य जुटा रहे हैं। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के उल्लंघन के पुख्ता दस्तावेज प्राप्त होते ही, कृषकों और आम जनता की जमा पूंजी के संरक्षण हेतु इस पूरे मामले को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court) में चुनौती दी जाएगी।

एक्सपर्ट व्यू

यह प्रकरण सहकारिता के मूल सिद्धांतों की घोर अवहेलना तथा प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता का निकृष्ट दृष्टांत है। जो केंद्रीय सहकारी बैंक संचित वित्तीय घाटे के कारण वेंटिलेटर पर हैं, उनके संचित कोष को विभागीय अधिकारियों के पारिश्रमिक हेतु ‘दुधारू गाय’ समझकर दुहना घोर वित्तीय कदाचार है। विडंबना देखिए, जिन नवागंतुकों ने संस्थान की देहरी तक नहीं लांघी, वे भी राजकोषीय बजटीय प्रावधानों के बजाय इन वाणिज्यिक निकायों के संसाधनों का अनैतिक शोषण कर रहे हैं। विधानसभा के पटल पर बैंकों को ‘वाणिज्यिक’ मानकर फिर यह विधिक विसंगति कारित करना विभाग के दोहरे नीतिगत चरित्र को उजागर करता है। यह परिपाटी न केवल बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट का उल्लंघन है, अपितु कृषकों की जमा पूंजी पर डाका है। उच्चस्तरीय विधिक जांच एवं राजकीय कोष से इस राशि की अविलंब प्रतिपूर्ति ही एकमात्र समाधान है, अन्यथा यह नियामक विफलता न्यायालय में जनहित याचिका के थपेड़ों से ध्वस्त होने को तैयार रहे।

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मुख्य प्रबंधक, केंद्रीय सहकारी बैंक — [नाम गोपनीय]

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बैंक कर्मचारी

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बैंक हितधारक (जोधपुर खंड)

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परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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