- वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2025-26 तक के करोड़ों रुपए खाद्य विभाग में अटके हैं। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए सारा ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ रही है।
- सरकार समितियों के मुनाफे का ढिंढोरा पीटकर करोड़ों के बिल रोक रही है। पुरानी परंपरा छोड़ उन्हें ‘खुली निविदा’ के जरिए बाजार की अंधी दौड़ में धकेला जा रहा है।

जयपुर, |विशेष संवाददाता प्रदेश डेस्क 29 जुलाई| राजस्थान विधानसभा में सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली से जुड़े एक ऐसे सच से पर्दा उठा है, जो अन्नदाताओं और उनसे जुड़ी संस्थाओं की बदहाली की कहानी बयां करने के लिए काफी है। नेता प्रतिपक्ष और अलवर ग्रामीण से विधायक श्री टीकाराम जूली के एक तीखे अतारांकित सवाल ने विभाग को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया कि महकमों की सुस्ती के चलते क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के परिवहन और हैण्डलिंग बिलों के करोड़ों रुपए कागजों में ही उलझकर रह गए हैं।विधानसभा के पटल पर रखे गए सहकारिता विभाग के लिखित आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2024-25 से लेकर 2025-26 तक का भारी-भरकम बकाया भुगतान खाद्य विभाग की चौखट पर दम तोड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि सरकार अपनी पीठ थपथपाने के बजाय सारा ठीकरा केंद्र सरकार के सिर फोड़ रही है। विभाग का कहना है कि जैसे ही ‘दिल्ली’ से योजना की राशि जारी होगी, वैसे ही समितियों के बकाए का भुगतान कर दिया जाएगा। सवाल यह उठता है कि आखिर समितियों ने तो अपना काम वक्त पर पूरा कर दिया था, तो फिर भुगतान के लिए उन्हें महीनों और सालों का चक्कर काटने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
घाटे पर पर्दा: समितियां लाभ में हैं, तो बिल क्यों अटकाए?
एक तरफ विभाग सदन में यह दावा करने से नहीं चूकता कि राज्य की अधिकांश क्रय-विक्रय सहकारी समितियां मुनाफे में चल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके करोड़ों रुपए के बिल रोककर उनकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। यदि ये समितियां वाकई लाभ में हैं, तो क्या शासन की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि उनके कामकाज को और सुगम बनाया जाए, न कि उन्हें प्रशासनिक लालफीताशाही के दलदल में धकेला जाए?
खुली निविदा का दस्तूर और सहकारिता की उपेक्षा
जब विभाग से यह सवाल किया गया कि क्या पीडीएस परिवहन का जिम्मा वापस पुरानी तर्ज पर सीधे क्रय-विक्रय सहकारी समितियों को सौंपा जाएगा, तो महकमे ने साफ पल्ला झाड़ते हुए ‘खुली निविदा’ (Open Tender) की नई पट्टी पढ़ा दी। जवाब में यह दलील दी गई कि निविदा प्रक्रिया में कोई भी भाग ले सकता है और समितियां भी नियमानुसार इसमें आ सकती हैं। यानी साफ है कि बरसों से सेवा दे रही सहकारी संस्थाओं को अब बाजार की खुली प्रतिस्पर्धा के इस खेल में अपने वजूद की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।


