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प्रदेश में 4 हजार पद खाली, एक व्यवस्थापक पर 5 समितियों का बोझ, फिर भी विभागीय अधिकारियों की ‘बैठकबाजी’ जारी

सार

राजस्थान की पैक्स-लैम्पस में 4,000 पद रिक्त होने से एक व्यवस्थापक पर 3-5 समितियों का अतिरिक्त बोझ है। विभाग की लगातार वीसी (VC) और ‘बैठक-कल्चर’ से कामकाज ठप है, जिससे किसान परेशान हैं। उर्वरकों के साथ जबरन उत्पाद थोपने के फरमान से नाराज संचालक बोर्डों ने इस अव्यावहारिक कार्यप्रणाली का विरोध शुरू कर दिया है।

विस्तार 

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​जयपुर। ॥डिजिटल ङेस्क 10 जुलाई ॥ राजस्थान के सहकारिता विभाग में इन दिनों ‘काम’ से ज्यादा ‘कमान’ का शोर है। मुख्यालय से जारी हो रहे विभागीय फरमानों ने पैक्स-लैम्पस (PACS-LAMPS) के कामकाज को पंगु बनाकर रख दिया है। एक ओर विभाग वीसी (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) के माध्यम से समीक्षा का ढोंग रच रहा है, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि इन बैठकों के कारण समितियों के ताले लटके हुए नजर आते हैं और किसान अपनी जरूरतों के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है ​दी राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड ने 10 जुलाई को दोपहर 3:00 से 6:00 बजे तक एक और मैराथन वीसी का आदेश थमा दिया है। ‘सहकार से समृद्धि’ और ‘बैंकिंग पैरामीटर्स‘ के नाम पर बुलाई गई इस बैठक में पैक्स व्यवस्थापकों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई है। आदेश के बिंदु संख्या 7 में ‘अन्य कोई आवश्यक विषय’ का जोड़कर विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें काम की चिंता कम और अपनी ‘उपलब्धियों’ के बखान की चिंता ज्यादा है तथा बैठकों के झमेले के साथ ही उर्वरक आपूर्तिकार कंपनीज की ‘जबरन टैगिंग’ नीति ने समितियों के धंधे को चौपट कर दिया है। उर्वरक के साथ अन्य अवांछित उत्पादों को थोपने के फरमान से गंगानगर से जयपुर तक की समितियां उबल रही हैं। निर्वाचित संचालक मंडल (Board of Directors)तथा पैक्स कार्मिक का साफ कहना है कि किसान को केवल खाद चाहिए, लेकिन उर्वरक आपूर्तिकार कंपनीज उसे अन्य उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। यदि यह मनमानी नहीं रुकी, तो समितियों ने उर्वरक वितरण का काम पूरी तरह ठप करने की चेतावनी दी है चौंकाने वाली बात यह है कि प्रदेश की पैक्स-लैम्पस में इस समय करीब 4,000 पद खाली पड़े हैं। आलम यह है कि एक व्यवस्थापक को 3 से 5 समितियों का अतिरिक्त कार्यभार संभालना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, सीसीबी बैंकों में रिक्त पदों के कारण ऋण पर्यवेक्षक (Loan Supervisor) की जिम्मेदारी भी उन्हीं व्यवस्थापकों पर डाल दी गई है। ऊपर से बैठकों का दबाव व्यवस्थापक की कमर तोड़ रहा है।

​”वेतन हम देते हैं, तो हुक्म विभाग का क्यों?”

​विभाग के इस रवैये ने प्रदेश की कुछेक समितियों के निर्वाचित संचालक मंडल (Board of Directors) और अधिकारियों के बीच सीधी तनातनी पैदा कर दी है। प्रदेश की कुछेक पैक्स-लैम्पस के निर्वाचित संचालक बोर्ड पदाधिकारियों का कहना है कि व्यवस्थापकों का वेतन समिति के निजी कोष से जाता है, न कि सरकारी खजाने से। ऐसे में विभाग को यह नैतिक अधिकार किसने दिया कि वह समिति का काम छोड़कर कार्मिकों को ‘आकाओं’ की तरह बैठकों में तलब करे?​ गुस्साए संचालक बोर्ड ने (Board of Directors) अपने स्तर पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए समिति कार्मिक को निर्देश दिए हैं कि “समिति का काम पहली प्राथमिकता है। बोर्ड की लिखित अनुमति के बिना कोई भी कार्मिक बैठक में नहीं जाएगा।आदेश न मानने वाले पर अनुशासनहीनता की कार्रवाई होगी। तथा सहकारी समितियों के संचालक मण्डल बोर्ड का आरोप है कि विभागीय अधिकारी जमीनी धरातल से पूरी तरह कट चुके हैं।खाद-बीज के पीक सीजन में जब किसान को समिति स्तर पर व्यवस्थापक की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, तब उन्हें जिला / ब्लाॅक मुख्यालयों पर घंटों ‘बैठक-कल्चर’ में उलझाकर रखा जाता है।संचालक मंडल बोर्ड ने (Board of Directors) तल्ख लहजे में कहा:

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अधिकारी सिर्फ कागजी महल बनाना जानते हैं। क्या हम सिर्फ रबर स्टैंप बनकर रह गए हैं? यदि यह अव्यावहारिक नीतियां और मीटिंगों का दौर बंद नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में प्रदेश की सहकारी समितियों पर हमेशा के लिए ताले लग जाएंगे और इसका सीधा नुकसान उन किसानों को होगा, जिनकी उम्मीदें इन समितियों से जुड़ी हैं।”

विभागीय अधिकारी फिर किस मर्ज की दवा?’

​प्रदेश की कुछेक समिति के संचालक मंडल बोर्ड (Board of Directors)ने सीधे तौर पर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। बोर्ड ऑफ ङायरेक्टर्स का कहना है कि जब जिला स्तरीय सहकारिता विभाग की यूनिट और केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) में प्रतिनियुक्ति पर विभागीय अधिकारी तैनात हैं, तो फिर हर तीसरे दिन प्रदेश स्तर से VC क्यों बुलाई जाती है? क्या विभागीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्षम हैं कि उन्हें हर बात के लिए पैक्स-लैम्पस कार्मिकों को ही रूबरू करना पड़ता है?

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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