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करोड़ों का ऋण बांटने वाले हाथों को खुद के वेतन का इंतज़ार; बजट में पैक्स कार्मिकों की अनदेखी से गहराया आक्रोश

सार 

Rajasthan : ग्राम सेवा सहकारी समितियों (Pacs-Lamps) के जरिए अन्नदाता को 25 हजार करोड़ के ब्याज मुक्त ऋण की सौगात, लेकिन ग्राम सेवा सहकारी समितियों के ’सारथियों’ के नसीब में फिर वही ’कैडर’ का सन्नाटा

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विस्तार 

जयपुर । 11 फरवरी | डिजिटल डेस्क | राजस्थान सरकार का ताजा बजट पेश हो चुका है। गलियारों में ‘प्रगतिशील’, ‘ऐतिहासिक’ और ‘क्रांतिकारी’ जैसे शब्दों की गूंज है। उद्योग चमक रहे हैं, कृषि बजट में 7.9 प्रतिशत की छलांग लग गई है और पहली बार प्रदेश ’आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) की उंगली थामकर भविष्य की ओर दौड़ लगा रहा है। लेकिन इस चमक-धमक वाली तस्वीर के पीछे एक स्याह कोना भी है, जहाँ प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं सहकारी आंदोलन के त्रि-स्तरीय ढांचे की रीढ़ मानी जाने वाली ’ग्राम सेवा सहकारी समितियों’ (PACS-LAMPS) के व्यवस्थापक आज भी ’कैडर’ की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं। सरकार ने किसानों के लिए 25,000 करोड़ के ब्याज मुक्त फसली ऋण का झुनझुना तो थमाया है, लेकिन इस ऋण योजना को धरातल पर उतारने वाले व्यवस्थापकों के खाली पेट और अनिश्चित भविष्य पर बजट की कलम चलते-चलते रुक गई।

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– सूरजभान सिंह आमेरा

ऑल राजस्थान को-आपरेटिव बैंक एम्प्लाइज यूनियन एवं ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रान्तीय महासचिव सहकार नेता सूरज भान सिंह आमेरा ने बजट का विश्लेषण करते हुए बजट को विकासोन्मुख तो बताया, लेकिन व्यवस्थापकों के कैडर की अनदेखी पर तीखी प्रतिक्रिया दी। आमेरा का कहना है कि बजट में कृषि क्षेत्र के लिए 7.9 प्रतिशत की वृद्धि और 35 लाख किसानों को 25,000 करोड़ का ब्याज मुक्त ऋण देने, 800 करोड़ का ब्याज अनुदान और अकृषि ऋण पर 5 प्रतिशत की राहत स्वागत योग्य है। लेकिन ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों के वेतन भुगतान की सुरक्षा के लिए ’कैडर’ बनाने की बहुप्रतीक्षित घोषणा न करना दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रदेश के पैक्स कार्मिक लंबे समय से नियमित वेतन के लिए जूझ रहे हैं, जबकि सहकारी बैंक करोड़ो का आयकर तक चुका रहे हैं। इस अनदेखी से कर्मचारियों में भारी निराशा है।

वर्षों से कैडर की कर रहें हैं मांग

इस बार के बजट का मुख्य आकर्षण ’आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ है। सरकार चाहती है कि राजस्थान के बच्चे भविष्य की तकनीक सीखें। यह विडंबना ही है कि एक तरफ सरकार एआई के जरिए ‘स्मार्ट’ होने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गांवों में ग्राम सेवा सहकारी समितियों पर काम करने वाले व्यवस्थापकों को कैडर और वेतन सुरक्षा देने में पीछे हट रही है। ग्राम सेवा सहकारी समितियों के कर्मचारी वर्षों से मांग कर रहे हैं कि उनका एक निश्चित कैडर बने ताकि उन्हें वेतन की सुरक्षा मिल सके। आज स्थिति यह है कि व्यवस्थापक करोड़ों का लेन-देन संभालता है, लेकिन खुद के परिवार के लिए बजट बनाते समय उसके हाथ कांपते हैं।

ब्याज अनुदान की घोषणा की थी उम्मीद

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अमराराम चौधरी

राज्य सरकार के बजट पर बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक मुख्य प्रबंधक अमराराम चौधरी ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भी स्वीकार किया कि कृषि, पशुपालन, ग्रामीण विकास तकनीकी व औद्योगिक विकास को समर्पित बजट है। उन्होंने कहा कि कृषि बजट में 7.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी और किसानों को 25,000 करोड़ रुपये के ब्याजमुक्त फसली ऋण की घोषणा सराहनीय है, हालांकि सहकारी संस्थाओं के लंबित ब्याज अनुदान पर भी घोषणा की उम्मीद थी।

व्यवस्थापक के हाथ फिर रहें खाली

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हनुमानसिंह राजावत

राजस्थान बहुउद्देशीय सहकारी सोसायटी कर्मचारी यूनियन (RMCSEU) के प्रदेश अध्यक्ष हनुमानसिंह राजावत ने भी बजट पर प्रतिक्रिया देकर कहा कि, ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों के वेतन भुगतान और सुरक्षा के लिए कैडर बनाने की घोषणा न होना अत्यंत निराशाजनक है। प्रदेश के पैक्स कार्मिक लंबे समय से नियमित वेतन से वंचित हैं, जबकि सहकारी बैंक निरंतर करोड़ो का आयकर चुका रहे हैं। इस अनदेखी से कार्मिकों के बीच गहरा असंतोष है। यह बजट उन लोगों के लिए तो ‘प्रगतिशील’ हो सकता है जो फाइलों और आंकड़ों के जादूगर हैं। लेकिन उन व्यवस्थापकों के लिए यह किसी ‘दुःस्वप्न’ से कम नहीं है, जिन्हें उम्मीद थी कि इस बार बजट के भाषण में ’कैडर’ शब्द स्वर्ण अक्षरों में लिखा होगा।

एक्सपर्ट व्यू

प्रदेश के सहकारी बैंक सरकार को भारी भरकम ’आयकर’ चुका रहे हैं, मुनाफे की डफली बजाई जा रही है, लेकिन उन्हीं बैंकों की बुनियाद यानी ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों को नियमित वेतन तक नसीब नहीं हो रहा। क्या सरकार को लगता है कि व्यवस्थापक केवल ’हवा और दुआओं’ पर जीवित रहकर सहकार से समृद्धि का पहिया घुमाते रहेंगे? बिना कैडर के पैक्स कार्मिकों में भारी असंतोष और निराशा है। यह असंतोष उस समय और गहरा हो जाता है जब सरकार हर वर्ग को कुछ न कुछ ’रेवड़ी’ या ’राहत’ बांट रही होती है, लेकिन सबसे मेहनतकश तबके को केवल ’आश्वासन’ की सूखी रोटी दी जाती है। सरकार को यह समझना होगा कि ‘सहकार से समृद्धि’ के दौर में बिना ’व्यवस्थापक’ के ’व्यवस्था’ नहीं सुधर सकती। यदि पैक्स कार्मिकों का नियमित वेतन और कैडर सुनिश्चित नहीं हुआ, तो 25,000 करोड़ के कर्ज का यह पहाड़ उन्हीं के कंधों पर ढह सकता है। अब देखना यह है कि क्या सरकार इस ‘निराशा’ को भांपकर कोई सुधारात्मक कदम उठाएगी या फिर व्यवस्थापक कैडर का नाम ढूँढते ही रह जाएंगे?

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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