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आमसभाओं में गरमाया मुद्दा: आखिर कब मिलेगा केंद्रीय सहकारी बैंकों को ऋण माफी और ब्याज अनुदान का पैसा?

​सार

सहकारी बैंकों की वार्षिक आमसभाओं में एक दशक पुरानी ऋण माफी का बकाया भुगतान न मिलने से बैंकों पर भारी वित्तीय संकट और लाभांश रोक का खतरा मंडरा रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। 

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​जयपुर | सहकारिता (Cooperative) जगत की ग्राउंड रिपोर्ट 30 सितंबर | प्रदेश के सहकारी सेक्टर (Sector) में इन दिनों केंद्रीय सहकारी बैंकों (Central Cooperative Banks – CCB) की आयोजित हो रही वार्षिक साधारण सभाएं तीखी चर्चाओं का केंद्र बनी हुई हैं। एक दशक पहले लागू की गई ऋण माफी योजना की बकाया राशि आज प्रदेश के अधिकांश सीसीबी के वित्तीय (Financial) स्वास्थ्य के लिए नासूर बन चुकी है। हालात यह हैं कि कभी करोड़ों के मुनाफे में रहने वाले ये बैंक अब संचित हानियों (Accumulated Losses) के दलदल में फंसते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर लाभांश (Dividend) वितरण पर पड़ रहा है। प्रदेश में करीब एक दशक पहले तत्कालीन सरकारों द्वारा कृषि ऋण माफी (Loan Waiver) की घोषणा की गई थी। इस योजना के तहत किसानों का कर्ज माफ तो कर दिया गया, लेकिन सहकारी सेक्टर की सहकारी बैंकों को उसका पुनर्भुगतान या ब्याज पेटे देय राशि समय पर वित्त विभाग (Finance Department) द्वारा जारी नहीं की गई। परिणामस्वरूप, जिला स्तरीय सहकारी संस्थाएं—यानी सीसीबी, जो कभी वित्तीय रूप से मजबूत हुआ करती थीं, आज इस बकाया राशि का अपने कोष से प्रावधान करने पर भारी-भरकम घाटे में दिखने लगीं।हाल ही में हो रही केंद्रीय सहकारी बैंकों की वार्षिक आमसभाओं में जब लाभांश वितरण पर चर्चा शुरू होती है, तो एजेंडे में ऋण माफी की बकाया राशि का प्रावधान करने पर संचित हानि का बड़ा सच सामने आ जाता है। आमसभाओं में सहकार नेतृत्व और अंशधारकों का यह सवाल गूंज रहा है कि “आखिर करोड़ों के प्रॉफिट में रहने वाली हमारी बैंक अचानक संचित हानि में कैसे चली गई?”

​सिस्टम से लड़ते-लड़ते थक चुका हैं सहकार नेतृत्व 

​इस बकाया राशि के आवंटन को लेकर सहकार नेतृत्वकर्ताओं का संघर्ष किसी से छिपा नहीं है। पिछले आठ वर्षों में वित्त विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और नाबार्ड (NABARD) जैसे शीर्ष संस्थानों को एक हजार से अधिक ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। इसके बावजूद वित्त विभाग की लंबी फेहरिस्त और जटिल प्रक्रियाओं के चलते बैंकों को राहत नहीं मिल पाई है। सहकारिता से जुड़े युनियन नेतृत्व अब सिस्टम से लड़ते-लड़ते थक चुके हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि समय रहते ऋण माफी और ब्याज अनुदान की बकाया राशि का आवंटन नहीं किया गया, तो प्रदेश का पूरा सहकार आंदोलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) चरमरा जाएगी।

 एक दशक का संघर्ष और कागजी फेहरिस्त में उलझी बकाया राशि

​प्रदेश के केंद्रीय सहकारी बैंकों के लिए एक दशक पहले की ऋण माफी अब जी का जंजाल बन गई है। बैंकों के पास आज भी सरकार स्तर से करोड़ों रुपये की बकाया राशि का भुगतान अटका हुआ है, जिसे पाने के लिए सहकार नेतृत्व ने मुख्यमंत्री कार्यालय, वित्त विभाग और नाबार्ड को एक हजार से अधिक ज्ञापन सौंपे हैं। लेकिन हर बार मामला वित्त विभाग की लंबी फेहरिस्त में उलझकर रह जाता है। नतीजा यह है कि कागजों में बैंक घाटे में चल रहे हैं, जिससे किसानों और पैक्स (PACS) से जुड़े सदस्यों को लाभांश का लाभ नहीं मिल पा रहा है। सहकार नेतृत्व कर्ता का कहना है कि सरकार की उदासीनता के कारण प्रदेश का मजबूत होता सहकारी आंदोलन अपनी ही व्यवस्थाओं के बीच घुटने टेकने को मजबूर हो गया है।

 लाभांश पर ब्रेक: मुनाफे में रहने वाले सीसीबी अब संचित हानि के शिकार

​इन दिनों आयोजित हो रही केंद्रीय सहकारी बैंकों की वार्षिक साधारण सभाओं में सबसे बड़ा मुद्दा लाभांश वितरण पर रोक का बना हुआ है। बैंकों के एजेंडे में जब ऋण माफी की बकाया राशि का प्रावधान किया जाता है, तो वित्तीय वर्ष का पूरा गणित बिगड़ जाता है और संचित हानि खुलकर सामने आ जाती है। कभी अपने शानदार वित्तीय कारोबार और करोड़ों के प्रॉफिट के लिए पहचानी जाने वाली सीसीबी आज वित्तीय बदहाली की मार झेल रही हैं। आमसभाओं में शेयरधारकों और सदस्यों द्वारा यही सवाल बार-बार उठाया जा रहा है कि आखिर सरकार सीसीबी को ऋण माफी और ब्याज दर की बकाया राशि कब तक जारी करेगी, ताकि बैंकों की वित्तीय स्थिति फिर से पटरी पर लौट सके।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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