सार
Rajasthan बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस पर राजस्थान प्रदेश बैंक एम्प्लाइज यूनियन ने निजीकरण को जनविरोधी बताते हुए सार्वजनिक व सहकारी बैंकों को बचाने का संकल्प लिया।
विस्तार

जयपुर। |डिजिटल डेस्क 19 जुलाई |बैंकिंग क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाले 19 जुलाई 1969 के ऐतिहासिक फैसले की यादें रविवार को जयपुर के तारक भवन में फिर ताजा हो गईं। राजस्थान प्रदेश बैंक एम्पलाईज यूनियन की ओर से आयोजित 57वें बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस समारोह में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि जिस उद्देश्य के साथ बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था, आज वह नीति पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है कार्यक्रम की अध्यक्षता रामगोपाल शर्मा ने की।समारोह को संबोधित करते हुए महासचिव महेश मिश्रा ने कहा कि 19 जुलाई 1969 का दिन भारतीय अर्थव्यवस्था का टर्निंग पॉइंट था। जब 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ, तो बैंकिंग केवल कुछ रईसों की तिजोरी तक सीमित न रहकर आम किसान, मजदूर और गांव-गांव की चौपाल तक पहुंची। आज की समृद्धि का आधार वही दूरदर्शी निर्णय है, जिसने बैंकिंग को सेवा का माध्यम बनाया।कार्यक्रम में सचिव महेश शर्मा, महिला विंग की संयोजिका मेघा मलिक, राहुल पांडे सहित अनेक वरिष्ठ बैंक अधिकारी, किसान और ग्राहकों ने भागीदारी निभाई। अंत में ‘राष्ट्रीयकरण जिंदाबाद’ और ‘निजीकरण बंद करो’ के नारों के साथ देशहित में बैंक बचाने का संकल्प लिया गया

वर्तमान चुनौती: ‘मुनाफा बनाम जनहित’
सहकार नेता सूरज भान सिंह आमेरा ने वर्तमान परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि आज बैंकिंग को केवल मुनाफे का जरिया बनाने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पीएमसी, यस बैंक और आदर्श सहकारी बैंक में हुए घोटालों ने यह साबित कर दिया है कि निजी बैंकों का मॉडल आम जनता की गाढ़ी कमाई के लिए असुरक्षित है। उन्होंने कहा, ”निजीकरण से बैंकिंग का सामाजिक स्वरूप छिन जाएगा, जिससे गरीब, किसान और लघु उद्यमी (MSME) ऋण सुविधा से पूरी तरह वंचित हो जाएंगे।निजीकरण का दंश केवल ग्राहकों पर ही नहीं, बल्कि बैंक कर्मियों पर भी भारी पड़ रहा है। पुरानी पेंशन की बहाली का मुद्दा हो या ठेके पर भर्ती की प्रक्रिया, केंद्र सरकार की नीतियां 10 लाख कर्मचारियों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही हैं। सहकारी बैंकों में भी पदों का न भरना ग्रामीण ऋण व्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहा है।


