सार
Rajasthan सूबे की ग्राम सेवा सहकारी समितियों में कार्यरत 3,794 व्यवस्थापकों और 4,080 सहायक व्यवस्थापकों के वेतन-भत्तों का संकट; अधिकांश जगह ‘पीएंडएल’ (P&L) के सहारे चल रहा है वेतन का पहिया
विस्तार 
जयपुर / सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट 18 सितंबर | राजस्थान की ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS) में कार्यरत हजारों व्यवस्थापकों और सहायक व्यवस्थापकों के वेतन भुगतान को लेकर एक चौंकाने वाली प्रशासनिक और वित्तीय तस्वीर सामने आई है।विभागीय स्तर से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्यभर की समितियों में कार्यरत कुल 3,794 व्यवस्थापकों और 4,080 सहायक व्यवस्थापकों का कुल वार्षिक वेतन और पारिश्रमिक (9,143.42 लाख रुपए) यानी 91.43 करोड़ रुपए से अधिक पहुंच गया है।सबसे बड़ा और चिंताजनक पहलू यह है कि इस भारी-भरकम राशि का भुगतान किसी सरकारी सहायता या अनुदान के बजाय,सीधे समितियों के लाभ-हानि खाते (P&L Account) से किया जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि कई पैक्स समितियों की वित्तीय स्थिति पहले से ही सुदृढ़ नहीं है, ऐसे में समितियों के स्वयं के लाभ-हानि खातों से वेतन का भुगतान होना इन जमीनी संस्थाओं पर भारी आर्थिक बोझ डाल रहा है, जिससे भविष्य में उनके सुचारू संचालन पर भी सवालिया निशान खड़े हो सकते हैं।
श्रीगंगानगर, बाड़मेर और चित्तौड़गढ़ में सबसे बड़ा वित्तीय भार
आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जिन केंद्रीय सहकारी बैंकों के अंतर्गत पैक्स समितियाँ आती हैं, वहाँ वेतन और वार्षिक पारिश्रमिक की राशि करोड़ों में है। उदाहरण के तौर पर:
- श्रीगंगानगर केंद्रीय सहकारी बैंक के क्षेत्र में पैक्स समितियों के व्यवस्थापकों का कुल वार्षिक वेतन/पारिश्रमिक योग लगभग 537.11 लाख रुपये (₹5.37 करोड़ से अधिक) तक पहुँच गया है, जबकि सहायक व्यवस्थापकों का योग 106.23 लाख रुपये है।
- बाड़मेर क्षेत्र में व्यवस्थापकों का वार्षिक वेतन योग 359.20 लाख रुपये दर्ज किया गया है।
- इसी प्रकार चित्तौड़गढ़ में व्यवस्थापकों का कुल वार्षिक वेतन 431.78 लाख रुपये और टोंक में 428.39 लाख रुपये तक दर्ज किया गया है।
वेतन के मुख्य आंकड़े एक नजर में:
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कुल व्यवस्थापक: 3,794 (मासिक वेतन: ₹4.39 करोड़, वार्षिक वेतन: लगभग ₹62.31 करोड़)
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कुल सहायक व्यवस्थापक: 4,080 (मासिक वेतन: ₹2.18 करोड़, वार्षिक वेतन व एरियर: लगभग ₹29.13 करोड़)
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कुल वित्तीय भार: 9,143.42 लाख रुपये (₹91.43 करोड़ से अधिक)
समिति स्तर पर व्यवस्था अधिक वित्तीय दबाव…?
आंकड़े बताते हैं कि भुगतान का जिम्मा पूरी तरह से संबंधित ‘समिति’ स्तर पर है और भुगतान का माध्यम ‘P&L’ (प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट) दर्शाया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य सरकार या केंद्रीय स्तर से कोई पृथक या सुनिश्चित वेतन सहायता मिलने के बजाय, समितियों को अपनी व्यावसायिक आय या मुनाफे से ही इन मैदानी कर्मचारियों के वेतन का प्रबंध करना पड़ रहा है।सहकारिता क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि जब तक पैक्स समितियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर या बहुउद्देशीय व्यावसायिक इकाइयों के रूप में पूरी तरह विकसित नहीं किया जाता, तब तक केवल लाभ-हानि खातों के भरोसे वेतन का भुगतान करना छोटी समितियों को घाटे की ओर धकेल सकता है। इससे ग्रामीण स्तर पर सहकारी आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले इन व्यवस्थापकों और सहायक व्यवस्थापकों के समय पर वेतन भुगतान को लेकर अनिश्चितता बनी रहने की आशंका है।


