Home राज्य राजस्थान सहकार से समृद्धि का दावा खोखला: 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान अटका, ‘पैक्स’ की तिजोरियों में सूखा

सहकार से समृद्धि का दावा खोखला: 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान अटका, ‘पैक्स’ की तिजोरियों में सूखा

सार

#Rajasthan सहकार से समृद्धि का दावा खोखला साबित हो रहा है। पैक्स का 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान अटका होने से समितियां कंगाली की कगार पर हैं और अधिकारी आंकड़ों के खेल में व्यस्त हैं।

विस्तार

जयपुर/|प्रदेश ङेस्क।21जुलाई |प्रदेश में ‘सहकार से समृद्धि’ का नारा इन दिनों सियासी गलियारों में खूब गूंज रहा है, लेकिन हकीकत की जमीन पर सहकारी आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र की कमर टूट चुकी है। आलम यह है कि नीति-निर्धारकों और वित्त विभाग के अधिकारी सहकारी संस्थाओं की सुध लेने के बजाय फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे हैं। सरकारी ‘फाइलों के जाल’ में उलझी बेबसी के चलते प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (पैक्स) अब कंगाली की कगार पर खड़ी हैं।केंद्र और राज्य सरकार की ओर से किसानों को दिए जाने वाले अल्पकालीन फसली सहकारी ऋण में समय पर अदायगी करने वाले किसानों को राज्य सरकार की ओर से 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जाना प्रावधानित है। लेकिन विडंबना देखिए, इस मद की करोड़ों रुपए की राशि लंबे समय से फाइलों में धूल फांक रही है। विभागीय उदासीनता का आलम यह है कि जो धन सीधे किसानों के हक में जाना चाहिए था, उसे जारी करने में अधिकारियों को रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है।

बैलेंस शीट चमकाने का ‘खेल’​

जानकारों की मानें तो वित्त विभाग के अफसर इस लंबित राशि को पीड़ी (PD) खाते में संधारित दिखाकर सीसीबी (CCB) स्तर पर अपनी साख और आंकड़ों को चमकाने में व्यस्त हैं। सहकारिता सेवा और बैंकिंग सेक्टर के आला अधिकारियों को किसानों की चिंता करने की फुर्सत कहाँ? उनकी प्राथमिकता में किसानों की बदहाली नहीं, बल्कि अपनी ‘बैलेंस शीट’ और सुख-सुविधाओं की वृद्धि है।एक तरफ सरकार की ओर से विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ पैक्स जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं आर्थिक बदहाली के दुष्चक्र में फंसी हैं। साख बचाने के नाम पर कहीं पांच, कहीं दस तो अधिकतम बीस हजार रुपए के ऋण वितरण कर इतिश्री की जा रही है। किसान को दी जाने वाली यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान राशि, सरकार के उन बड़े-बड़े वादों की हवा निकालने के लिए पर्याप्त है।

आरटीआई के आईने में दिखेगा ‘झूठ का पुलिंदा’

​सत्ता के गलियारों में बैठे वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों द्वारा रचे जा रहे इन ‘झूठ के पुलों’ का हिसाब जल्द ही जनता के सामने होगा। सरकारें तो पांच साल के लिए आती हैं, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों को यह भूलना नहीं चाहिए कि फाइलें कभी मरती नहीं हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद जब इन फाइलों की धूल झाड़ी जाएगी, तो आरटीआई के आईने में इन अधिकारियों के ‘आंकड़ों के खेल’ और लंबित राशियों का कड़वा सच जनता के सामने होगा। तब जवाब देना और भी भारी पड़ेगा।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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