सार
Rajasthan के पैक्स-लैम्पस कार्मिकों ने सहकारिता विभाग की वादाखिलाफी के विरोध में 15 अक्टूबर तक मांगें पूरी न होने पर अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी दी है। राष्ट्रीय गौरव हासिल करने वाले ये मैदानी प्रहारी लंबे समय से वेतन और सेवा नियमों के लिए संघर्षरत हैं।
विस्तार
जयपुर: | सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट 24 सितंबर |राजस्थान में सहकारी आंदोलन (Cooperative Movement) और ग्राम्य आंचल की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स/लैम्पस) के व्यवस्थापक एवं कार्मिक लंबे समय से प्रशासनिक उपेक्षा और आर्थिक संत्रास के भंवर में जीने को विवश हैं। राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले प्रदेश के कार्मिकों ने सहकारिता मंत्री को अंतिम नीतिगत परिवेदना प्रेषित करते हुए विभाग की तीन दशक पुरानी अकर्मण्य कार्यशैली और समझौतों से मुकरने की प्रवृत्ति पर कड़ा रोष व्यक्त किया है।
सहकारी ढांचे के त्रिस्तरीय तंत्र के अंतिम छोर पर खड़े ये कार्मिक आज भी अपनी माहवारी वेतन (Monthly Salary) और सेवा नियमों (Service Rules) जैसी मूलभूत मांगों के लिए संघर्षरत हैं। स्थिति यह है कि प्रदेश की पचास प्रतिशत से अधिक पैक्स-लैम्पस संस्थाएं व्यवस्थापक जैसे महत्वपूर्ण पदों के बिना रीढ़हीन रूप से संचालित हो रही हैं। एक तरफ जहां सीमित संस्थागत स्थायित्व और शून्य आर्थिक सक्षमता है, वहीं दूसरी तरफ इन संस्थानों पर केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) के ऋण पर्यवेक्षक (Loan Supervisor) के जटिल दायित्वों का बोझ लाद दिया गया है। इसके अलावा फसली ऋणों के वितरण, पैक्स कंप्यूटराइजेशन (PACS Computerization) और अन्य तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं का सफल निष्पादन दिन-रात बिना वेतन के करवाया जा रहा है।
संघर्ष समिति के संयोजकों ने बताया कि गत 06 अक्टूबर 2025 को हुई उच्च स्तरीय वार्ताओं में कैडर अथॉरिटी (Cadre Authority) के गठन, नियमितीकरण (Screening), बैंकिंग सहायक भर्ती, बैंक ऋण पर्यवेक्षक पद पर चयन और नाबार्ड (NABARD) की नवीन एच.आर. पॉलिसी (HR Policy) जैसे बिंदुओं पर ठोस सहमति बनी थी। परंतु एक वर्ष (350 से अधिक दिन) बीत जाने के बाद भी एक इंच प्रगति न होना यह साबित करता है कि विभागीय संस्कृति समझौतों से मुकरने की आदी हो चुकी है।कर्मचारियों यूनियन नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि यदि आगामी 15 अक्टूबर 2026 तक सभी लंबित मांगों के संबंध में ठोस और स्पष्ट नीतिगत आदेश जारी नहीं किए गए, तो प्रदेशभर के पैक्स-लैम्पस कार्मिक पूर्णतः कार्य बहिष्कार एवं अनिश्चितकालीन हड़ताल का कठोर मार्ग अपनाने के लिए बाध्य होंगे। इस आंदोलन और अन्नदाताओं को मिलने वाले फसली ऋणों में आने वाली बाधाओं की समस्त नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी शासन और सहकारिता विभाग की होगी।
राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान को मिला गौरव, मैदानी प्रहारी झेल रहे हैं वेतनविहीन जीवन
प्रदेश में सहकारिता मंत्रालय के पांच वर्ष पूर्ण होने पर दिल्ली में आयोजित देशव्यापी समारोह में राजस्थान को ‘सहकारिता की नवीन पहलों को धरातल पर उतारने का प्रथम राष्ट्रीय गौरव’ प्राप्त हुआ है। इस बड़ी उपलब्धि का पूरा श्रेय मैदानी मोर्चे पर पसीना बहाने वाले पैक्स-लैम्पस कर्मियों की रणनीतिक कार्यशैली (Strategic Working Style) को जाता है। विडंबना यह है कि जिन कर्मठ प्रहरियों के बलबूते पर यह राष्ट्रीय खिताब राज्य को मिला, उन्हीं कार्मिकों को महीनों तक आर्थिक संत्रास और वेतनविहीन जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ रहा है। बिना वेतन के दिन-रात कार्य करने वाले ये व्यवस्थापक आज भी अपनी माहवारी पगार के लिए तरस रहे हैं, जिससे प्रशासनिक संवेदनहीनता स्पष्ट रूप से उजागर होती है।
कार्मिकों को मंत्री के यशस्वी नेतृत्व व वचनों पर अटूट आस्था, अधिकारियों पर लगाया विश्वास कुचलने का आरोप
पैक्स-लैम्पस के कार्मिकों का कहना है कि वे जनता द्वारा निर्वाचित एक ऐसे उच्च कोटि के नेतृत्व पर भरोसा करते हैं, जिनके वचनों की पवित्रता और दिए गए आश्वासन सर्वोपरि हैं। पूर्व में सहकार और रोजगार उत्सव (Employment Festival) के दौरान जयपुर की सड़कों पर भारी बारिश के बावजूद उमड़ा विराट जन सैलाब मंत्री महोदय के एक इशारे पर अपनी शक्ति झोंकने को तत्पर था। परंतु, जब विभाग के अधिकारी ही मंत्री की प्रतिष्ठा और कार्मिकों के विश्वास को कुचलते हुए नजर आते हैं, तो व्यवस्था के प्रति गहरा क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। कार्मिकों को अब केवल सहकारिता मंत्री के यशस्वी और भरोसेमंद वचनों से ही न्याय की आस है।


