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राजस्थान में सहकारी के गढ़ों में चुनाव का दंभ: दो साल में 26 संस्थाओं में लोकतंत्र बहाल, पर प्रशासनिक सुस्ती और अदालती पेचीदगियों ने रोके कदम

सार

राजस्थान सहकारिता विभाग ने दो साल में 26 संस्थाओं में चुनाव कराकर लोकतंत्र बहाल करने का दावा किया है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती, पुलिस जाब्ते की कमी और अदालती पेचीदगियों के कारण चुनाव प्रक्रिया लगातार बाधित हो रही है।

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​जयपुर:|सहकारी जगत की (Ground Report) 3 अक्टूबर।राज्य के ग्रामीण आंचल की रीढ़ कही जाने वाली सहकारी संस्थाओं में बीते दो वर्षों से जारी चुनावी सुस्ती को चीरते हुए राजस्थान राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण (Rajasthan State Cooperative Election Authority) ने आखिरकार 26 सहकारी संस्थाओं में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली का बिगुल फूंक दिया है। जमीनी स्तर पर प्रशासनिक दक्षता (Administrative Efficiency) और पारदर्शिता (Transparency) के दावों के बीच यह कवायद भले ही सहकारिता के ढांचे को संजीवनी देने का दावा कर रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि इन चुनावों की राह आसान नहीं रही है।​प्राधिकरण से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, एक केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank – CCB), सात क्रय-विक्रय सहकारी समितियां (Kraya Vikraya Sahakari Samiti – KVSS), तीन उपभोक्ता होलसेल भंडार और चौदह प्राथमिक ग्राम सेवा सहकारी समितियां (Primary Agricultural Credit Society / Gram Seva Sahakari Samiti – PACS/GSS) में रिक्त पड़े संचालक मंडलों, वार्ड सदस्यों और पदाधिकारियों के निर्वाचन की औपचारिकताएं पूरी की जा चुकी हैं। अलवर सीसीबी से लेकर नीमकाथाना, श्रीडूंगरगढ़, सांचौर, बयाना और अलवर जैसी प्रमुख केवीएसएस तथा बूंदी, झालावाड़ और सवाई माधोपुर के उपभोक्ता भंडारों में चुनाव का शोर तो गूंजा है, मगर यह सब उस व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है, जो सालों से रिक्त पदों पर ताले जड़े बैठी थी।ग्रामीण क्षेत्रों की जीवनरेखा मानी जाने वाली पैक्स समितियों—चाहे वह चित्तौड़गढ़ का आकोला कलां हो, जोधपुर का पीपाड़सिटी हो या श्रीगंगानगर के मुकलावा और लिखमेवाला हो—हर जगह किसानों और ग्रामीण मतदाताओं के हक की लड़ाई कागजी आदेशों और तारीखों के फेर में उलझी नजर आई है। इन चुनावों के जरिए सहकारिता की चूलें मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन क्या महज कुछेक संस्थाओं में आनन-फानन में चुनाव करवा देने से सहकारिता भ्रष्टाचार (Corruption) और भाई-भतीजावाद (Nepotism) के दलदल से बाहर निकल पाएगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सहकारिता विभाग (Cooperative Department) के पास भी नदारद है।

​अदालती चाबुक और पंच निर्णायक के आदेशों से हवा-हवाई हुए चुनाव, जहाजपुर केवीएसएस का निर्वाचन शून्य घोषित

​सहकारिता विभाग के महकमों में किस कदर मनमानी और नियमों की अनदेखी हावी है, इसकी बानगी उच्च न्यायालय (High Court) के कड़े रुख और पंच निर्णायक (Arbitrator) के फैसलों से साफ झलकती है। ताजा प्रकरणों में भीलवाड़ा की जहाजपुर क्रय-विक्रय सहकारी समिति (KVSS) का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां कानूनी और प्रशासनिक खामियों के चलते पूरी निर्वाचन प्रक्रिया को ही शून्य घोषित करना पड़ा।​अदालत के आदेशों की गाज ऐसी गिरी कि प्राधिकरण को अपने ही पूर्व में जारी आदेशों को शर्मिंदा होकर वापस लेना पड़ा। जानकारों का मानना है कि जल्दबाजी और कागजी खानापूर्ति के चक्कर में निर्वाचन प्राधिकरण नियमों के दायरे से बाहर जाकर फैसले ले रहा है, जिसका खामियाजा अंततः सहकारी संस्थाओं से जुड़े आम किसानों और सदस्यों को भुगतना पड़ता है। अदालतों की सख्ती यह चीख-चीख कर कह रही है कि जब तक सहकारिता के हुक्मरान अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता (Transparency) नहीं लाएंगे, तब तक कानूनी शिकंजे और प्रशासनिक फेरबदल यूं ही लोकतंत्र का मजाक बनाते रहेंगे।

​ त्योहार और पुलिस जाब्ते का टोटा:  चुनावी तारीखों पर प्राधिकरण का पहरा

लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव यानी चुनावों में भी प्रशासनिक लाचारी और पुलिस महकमे की बेरुसी किस कदर हावी रहती है, इसकी बानगी राज्य के कई जिलों में देखने को मिली है। कानून-व्यवस्था (Law and Order) का हवाला देकर और त्योहारों का रोना रोकर बीकानेर के छतरगढ़, सीकर के नीमकाथाना केवीएसएस और बारां के मंडोला जैसी महत्वपूर्ण पैक्स समितियों के घोषित चुनावी कार्यक्रमों में अचानक फेरबदल करना पड़ा।हालात यह हैं कि निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा तारीखें तय होने के बावजूद ऐन मौके पर पुलिस जाब्ता न मिलने का बहाना बनाकर चुनाव टाल दिए जाते हैं। क्या राज्य का प्रशासनिक तंत्र इतना कमजोर हो चुका है कि वह सहकारी समितियों के छोटे-छोटे चुनावों में भी सुरक्षा मुहैया नहीं करा पा रहा? यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता (Administrative Failure) को उजागर करती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि सरकार और महकमे की प्राथमिकता में ग्रामीण लोकतंत्र कभी भी शीर्ष पर नहीं रहा है, बल्कि इसे महज औपचारिकता मानकर टाला जाता रहा है।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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