सार
जालोर केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) की अरणाय शाखा में खराब प्रबंधन, अतिरिक्त कार्यभार और FIG पोर्टल के कारण ₹10 करोड़ का बकाया/NPA हो गया है। सख्त मॉनिटरिंग के अभाव में recovery तंत्र ठप है, जिससे PACS समितियां बर्बादी की कगार पर हैं।
विस्तार 
जालोर (Jalore)। सहकारी जगत ग्राउंड रिपोर्ट 21अक्टूबर | जिले में सहकारी आंदोलन (Cooperative Movement) की रीढ़ कहे जाने वाले केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Co-operative Bank – CCB) की शाखाओं के कार्यक्षेत्र में स्थिति गंभीर होती जा रही है। वर्तमान कार्य-परिदृश्य में जिले की पैक्स (Primary Agricultural Credit Societies – PACS) स्तर पर बढ़ता बकाया, अवधिपार (Overdue) और एनपीए (Non-Performing Asset – NPA) का करीब 108 करोड़ का ग्राफ सीसीबी (CCB) के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है। वर्तमान लचर कार्य-परिदृश्य, मनमाफिक तरीके से समितियों में व्यवस्थापक (Manager) पदों पर तैनाती और एफआईजी (FIG) पोर्टल पद्धति ने अवधिपार और एनपीए (NPA) राशि को बढ़ाने में कोढ़ में खाज का काम किया है। वर्ष 2019 में फसली सहकारी ऋण वितरण के लिए लागू की गई ऑनलाइन प्रणाली के पश्चात जिले में सात सालों में 108 करोड़ की भारी-भरकम अवधिपार ऋण राशि बकाया पड़ी है। वर्तमान परिदृश्य में ऑनलाइन पंजीयन के पश्चात येन-केन-प्रकारेण फसली ऋण प्राप्त करके ऋण माफी का लाभ लेने और ऋण वितरण प्राप्त करने वाले साख के जमाने का चलन एफआईजी (FIG) पोर्टल नीति में लुप्त होकर रह गया है। हालात यह हैं कि शीर्ष स्तरीय नेतृत्व की उदासीनता से ऐसा प्रतीत होता है कि वे इस सेक्टर को पूरी तरह डुबाकर ही दम लेंगे।
आंकड़ों के मोर्चे पर स्थिति यह है कि सीसीबी (CCB) की अरणाय (Arnay) शाखा कार्यक्षेत्र में बकाया अवधिपार राशि का अनुमानित एनपीए (NPA) ग्राफ 10 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, तथा कुल अवधिपार का आंकड़ा 9 करोड़ की भारी-भरकम राशि से वसूली तंत्र ने दूरी बना ली है।सीसीबी (CCB) स्तर से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अरणाय (Arnay) शाखा कार्यक्षेत्र की समितियों में 30.06.2026 तक की स्थिति में सेडिया (Sediya) का अवधिपार/एनपीए (NPA) 3.51 लाख, जैलातरा (Jelatara) का 12.81 लाख, अरणाय (Arnay) का 43.41 लाख, बिजरोल (Burol) का 46.15 लाख, गुन्दाऊ (Gundau) का 42.13 लाख, देवड़ा (Devda) का 83.52 लाख, खारा (Khara) का 29.22 लाख, चौरा (Choura) का 65.88 लाख, जोधावास (Jodhawas) का 33.25 लाख, पमाना (Pamana) का 66.01 लाख, कारावड़ी (Karawadi) का 57.14 लाख, हरियाली (Hariyali) का 50.75 लाख, राजीव नगर (Rajeev Nagar) का 49.55 लाख, मालवाड़ा (Malwada) का 88.69 लाख, भादरूणा (Bhadruna) का 63.83 लाख, निम्बाऊ (Nimbau) का 328.66 लाख, डांगरा (Dangra) का 213.98 लाख और पुर जीएसएस (Pur GSS) का 9.13 लाख रुपए दर्ज है।
दूसरी ओर जिले में सीसीबी (CCB) प्रशासनिक कुप्रबंधन का आलम यह है कि कैडर अनुभाग ने जिले में कई समितियों में व्यवस्थापकों (Managers) के पास अत्यधिक कार्यभार का बोझ लाद दिया है। इसी शाखा में अरणाय (Arnay) व्यवस्थापक के पास राजीव नगर (Rajeev Nagar), जोधावास (Jodhawas), पुर (Pur) तथा महिला बहुउद्देशीय धानता समिति का अतिरिक्त कार्यभार है, तो बिजरोल व्यवस्थापक के पास पमाना (Pamana), भादरूणा (Bhadruna) और मालवाड़ा (Malwada) का प्रभार है। इसी तरह चौरा (Choura) व्यवस्थापक के पास हरियाली (Hariyali), गुन्दाऊ (Gundau) व्यवस्थापक के पास सेडिया (Sediya), और देवड़ा (Devda) व्यवस्थापक के पास जैलातरा (Jelatara) जैसी कई समितियों के व्यवस्थापक पद का अतिरिक्त बोझ लाद दिया गया है, जिससे सुचारू संचालन और ऋण वसूली (Loan Recovery) का तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है।
अतीत का स्वर्णिम सहकार काल: जब धनसिंह देवल की सख्ती से वसूल होती थी पाई-पाई।
जिले में कभी सहकारी आंदोलन (Cooperative Movement) की जड़ें मजबूत करने वाले सहकारिता सेवा (Cooperative Service) के वरिष्ठ अधिकारी धनसिंह देवल (Dhan Singh Deval) ने इसी बैंक (Bank) को अवधिपार (Overdue) और एनपीए (NPA) की शत-प्रतिशत वसूली कर सफलता के शिखर पर पहुंचाया था। देवल की कार्यप्रणाली का ऐसा आलम था कि बैंकिंग सेक्टर (Banking Sector) में पाई-पाई की वसूली समय पर निश्चित रूप से संपन्न हो जाती थी। कार्य के प्रति लापरवाह पैक्स (PACS) से लेकर बैंकिंग कर्मियों तक को तुरंत निलंबित करने का उनके पास एक सशक्त प्रशासनिक जज़्बा था। एक बार चालू बकाया की मात्र बीस करोड़ रुपए की वसूली समय पर संपन्न नहीं होने पर उन्होंने एक साथ दस लापरवाह पैक्स व्यवस्थापकों को निलंबित कर दिया था, जिसमें व्यवस्थापकों के धाकड़ यूनियन नेता मदननाथ तक शामिल थे, जिनका राजधानी के गलियारों तक नाम गूंजता था। आज उसी प्रशासनिक दृढ़ इच्छाशक्ति और सख्त मॉनिटरिंग (Monitoring) के अभाव में वसूली का तंत्र पूरी तरह से ठप पड़ गया है।
बंद पड़ी तिलम संघ (Tilam Sangh) की ऑयल मिलें (Oil Mills) और अकुशल प्रबंधन की मार।

जिले में सहकारी क्षेत्र की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में यदि सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और विकट हो जाएगी। किसी जमाने में इन्हीं पैक्स (PACS) की तरह गांवों में तिलम उत्पादक सहकारी समितियां कार्यरत हुआ करती थीं, जो समर्थन मूल्य ( MSP) पर खरीद के लिए एक मजबूत इकाई थीं। लेकिन अपात्र और अकुशल प्रबंधन की मनमाफिक नीतियों के चलते ये समितियां आवासहीन होकर पूरी तरह बंद हो गई हैं। विभागीय स्तर पर प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, जालोर (Jalore) में मई 1991 में 541.47 लाख रुपये के निवेश से स्थापित तिलम संघ (Tilam Sangh) की ऑयल मिल (Oil Mill) वर्ष 1997 से ही पूरी तरह बंद पड़ी है। आज जिले में स्थापित तिलम संघ (Tilam Sangh) की यह मिल इतिहास के पन्नों में समा चुकी है, जो सहकारिता के लचर और दिशाहीन प्रशासनिक प्रबंध की पोल खोलती है।वर्तमान में निंबाऊ (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति / Non-Performing Asset – NPA 328.66 लाख), डांगरा और पुर ग्राम सेवा सहकारी समितियां – Gram Seva Sahakari Samiti (GSS) जैसे उदाहरण बताते हैं कि अरणाय शाखा क्षेत्र के PACS भी उसी बर्बादी की कगार पर खड़े हैं। अगर समय रहते कठोर नीति लागू कर NPA की इस दीमक को नहीं रोका गया, तो rural economy का यह गौरवशाली अतीत पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएगा।


