सार
Jodhpur : संभाग के सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का बोलबाला है। किसानों के 70 लाख रुपये गबन के मामले में पूर्व एमडी की गिरफ्तारी और चहेते अधिकारियों को नियमों के विरुद्ध मलाईदार पदों पर बिठाने से विभाग की साख गिरी है…!

विस्तार
जोधपुर | डिजिटल डेस्क | 18 अप्रैल | खंड के सहकारिता विभाग में इन दिनों ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाला हाल है, जहां मलाईदार कुर्सियों पर बैठने की होड़ और भ्रष्टाचार के कारनामों ने विभाग की साख को धूल में मिला दिया है। जैसलमेर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में किसानों के हकों पर डाका डालने का जो खेल खेला गया, उसका पर्दाफाश होते ही विभाग की नींद उड़ी है। किसानों के 70 लाख रुपये के क्लेम डकारने के आरोप में बैंक के पूर्व एमडी जगदीश सुथार की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं। विडंबना देखिए कि करोड़ों का गबन करने वाले ये साहब बाड़मेर में उप रजिस्ट्रार जैसे रसूखदार पद पर मजे काट रहे थे, मानो ईमानदारी का इनाम मिला हो।
जोधपुर खंड के जिलों में अधिकारियों की कुर्सी-दौड़ का तमाशा भी कम निराला नहीं है। जोधपुर में खंडीय अतिरिक्त रजिस्ट्रार जैसा महत्वपूर्ण पद लंबे समय से लावारिस है, जिसे ‘जुगाड़’ के सहारे चलाया जा रहा है। दो दशक से एक ही सीट पर जमे जोधपुर नागरिक सहकारी बैंक के एमडी देवेंद्र अमरावत को इसका अतिरिक्त जिम्मा सौंपकर विभाग ने इतिश्री कर ली है। नियम-कायदों को ताक पर रखकर जूनियर अधिकारियों को सीनियर पदों का मोह बांटना यहां की परंपरा बन गई है। इसका जीवंत उदाहरण जोधपुर में एडिशनल रजिस्ट्रार (लीगल) के पद पर तैनात श्यामलाल मीणा हैं, जो सीनियर स्केल की पोस्ट पर ऑर्डिनरी स्केल के बावजूद जमे हुए हैं।
बाड़मेर और पाली जैसे जिलों में भी व्यवस्थाएं राम भरोसे ही हैं। बाड़मेर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, जो कभी किसानों की लाइफलाइन हुआ करता था, आज बिना किसी स्थाई एमडी के बदहाली के आंसू रो रहा है। इसका अतिरिक्त प्रभार जोधपुर सीसीबी के एमडी अनिल बिश्नोई के पास है, जिनके कार्यकाल में ऋण वसूली का ग्राफ जमीन छू रहा है, लेकिन जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं है। पाली में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है, जहां संयुक्त रजिस्ट्रार जितेंद्र गोदारा को उप रजिस्ट्रार के पद पर ‘डिमोशन’ जैसी तैनाती देकर बिठाया गया है। यह समझ से परे है कि कहीं सीनियर को जूनियर के नीचे लगाया जा रहा है, तो कहीं चहेतों को उपकृत करने के लिए नियमों की बलि दी जा रही है। सहकारिता के नाम पर जोधपुर, जालोर, सिरोही और बालोतरा तक फैले इस साम्राज्य में पारदर्शिता सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है, जबकि हकीकत में यह विभाग चहेते अधिकारियों की ‘सेटलमेंट’ एजेंसी बनकर रह गया है।


