सारांश
दीपावली से पूर्व बोनस (Bonus) की पुरज़ोर माँग के बीच कागज़ी दावों की धज्जियाँ उड़ रही हैं। सरकारी रेवड़ी कल्चर, भारी-भरकम खर्चों और शोषक नीतियों ने राजस्थान की सहकारी संस्थाओं को कंगाली और संचित हानि (Accumulated Loss) के मुहाने पर लाकर पटक दिया है।
विस्तार 
जयपुर |ग्राउंड रिपोर्ट 14अक्टूबर |दीपावली के त्योहार से ठीक पहले प्रदेश की सहकारी संस्थाओं में बोनस (Bonus) और एक्स-ग्रेसिया (Ex-Gratia) वितरण को लेकर माँगें तेज़ हो गई हैं। ऑल राजस्थान कॉ-ऑपरेटिव बैंक एम्प्लॉईज़ यूनियन (All Rajasthan Co-operative Bank Employees Union), ऑफिसर्स एसोसिएशन (Officers Association) तथा सहकारी साख समितियाँ एम्प्लॉईज़ यूनियन के प्रांतीय महासचिव सूरज भान सिंह आमेरा ने रजिस्ट्रार, सहकारी समितियाँ को ज्ञापन सौंपकर दीपावली से पूर्व वर्ष 2025-26 के लिए समस्त नियमित, संविदा, अनुकंपा व प्रोबेशनरी कार्मिकों को अधिकतम 20 प्रतिशत बोनस तथा बोनस परिधि से बाहर के अधिकारियों-कर्मचारियों को 20 प्रतिशत के समतुल्य एक्स-ग्रेसिया नकद भुगतान करने की माँग की है। संगठन का तर्क है कि कार्मिकों ने पीएम किसान (PM Kisan), केसीसी (KCC), फसली ऋण और पैक्स (PACS) कंप्यूट्रीकरण में दिन-रात मेहनत की है तथा हाल ही में आरबीआई (RBI) द्वारा रेपो रेट (Repo Rate) में की गई वृद्धि के कारण बढ़ती महँगाई में कर्मचारियों को आर्थिक संबल मिलना आवश्यक है।लेकिन इस बोनस की माँग के समानांतर धरातल की हकीकत बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। प्रदेश में सहकारी आंदोलन की अधिकांश सहकारी संस्थाएँ, जिनमें केवीएसएस (KVSS), जिला उपभोक्ता होलसेल भंडार तथा केंद्रीय सहकारी बैंक के अलावा पैक्स-लैम्पस शामिल हैं, वर्तमान परिदृश्य में सरकार की दमनकारी नीतियों और रेवड़ी कल्चर के कारण गंभीर संचित हानि (Accumulated Loss) के दौर से गुजर रही हैं। मुख्य रूप से केंद्रीय सहकारी बैंक, जिन्हें ऋण माफी और ब्याज मुक्त योजनाओं के अलावा भारी-भरकम वेतनमान समझौतों, एरियर भुगतान और राज्य सरकार की प्रतिनियुक्तियों का सामना करना पड़ रहा है, वे अपने सदस्यों और अंशधारकों (जो संस्था के वास्तविक मालिक हैं) को लाभांश (Dividend) वितरित करने में हाँफ रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ भारी-भरकम खर्चों को प्राथमिकता दिए जाने की पैरवी खड़ी की जा रही है।
विघटन की हवा और जबरन टैगिंग उत्पादों ने पैक्स-लैम्पस को बनाया कंगाल
प्रदेश मे इस वक्त सहकारी आंदोलन की सबसे छोटी और सबसे मजबूत इकाई पैक्स (PACS) और लैम्पस (LAMPS) अपने सबसे बुरे दौर में खड़ी हैं। यहाँ नवीन गठन की ऐसी हवा चली कि राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम (Rajasthan Cooperative Societies Act) के प्रावधान हवा में उड़ते हुए नजर आए। विघटन प्रक्रिया के साथ-साथ सरकार की ब्याज मुक्त ऋण योजना और उर्वरक व्यवसाय में नामचीन कंपनियों की बाध्यता के चलते कंपनियों के टैगिंग उत्पादों ने पूरे प्रदेश में पचास फीसदी पैक्स-लैम्पस की जमा पूँजी के रिजर्व फंड (Reserve Fund) को चाटकर पूरी तरह खत्म कर दिया है।गौरतलब है कि अधिकांश केंद्रीय सहकारी बैंकों से लेकर केवीएसएस और पैक्स-लैम्पस एक स्वायत्तशासी (Autonomous) निकाय हैं, जिन्हें अपने संस्थागत स्थायित्व के खर्च खुद के कोष से वहन करने होते हैं तथा वित्तीय वर्ष में लाभांश (Dividend) अर्जित करने पर पहला हक सदस्य और अंशधारक का होता है। लेकिन एकादुक्का संस्थाओं को छोड़कर वित्तीय वर्ष में अपने शेयरधारकों (Shareholders) को लाभांश वितरित करने में सहकारी संस्थाएँ लगातार पिछड़ने लगी हैं।
FIG पोर्टल की ‘ब्याज पर ब्याज’ नीति और ऑडिट फीस के लाले
पैक्स और लैम्पस के वित्तीय ढाँचे को तहस-नहस करने में वर्तमान प्रशासनिक नीतियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक तरफ जहाँ संस्थाएँ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं, वहीं वर्तमान में एफआईजी (FIG) पोर्टल पॉलिसी की ‘ब्याज पर ब्याज’ (Interest on Interest) वसूलने की आत्मघाती नीति ने ऐसा खंज़र घोंप दिया है कि समितियों की वित्तीय रीढ़ ही टूट गई है।हालात यह हो चुके हैं कि प्रदेश की इन बुनियादी इकाइयों के पास वैधानिक ऑडिट फीस (Audit Fees) तक चुकाने के लाले पड़ने शुरू हो गए हैं। जहाँ सहकारी संस्थाओं के मूल स्वामियों यानी सदस्यों और अंशधारकों को लाभांश मिलने की उम्मीदें धूमिल हो चुकी हैं, वहीं दूसरी ओर वित्तीय कुप्रबंधन और पोर्टल की जटिल नीतियों के कारण इन संस्थाओं के समक्ष अपने दैनिक प्रशासनिक खर्च चलाना भी दूभर होता जा रहा है।


