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सहकारिता विभाग की नीति और आरबीआई के ‘फिट एंड प्रॉपर’ (Fit and Proper) मानदंडों के बीच उलझे केंद्रीय सहकारी बैंक (CCBs), एमडी (MD/CEO) पदों पर असमंजस!

सार

राजस्थान के केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) में MD/CEO पद पर सहकारिता विभाग की प्रतिनियुक्ति नीति और RBI के ‘फिट एंड प्रॉपर’ (8 वर्ष का बैंकिंग अनुभव) मानदंडों के बीच टकराव से नीतिगत असमंजस पैदा हो गया है। कई जिलों के सीईओ अयोग्य पाए गए हैं।

विस्तार

जयपुर:| सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट | 7 नवंबर|राजस्थान में सहकारिता विभाग के नियमों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े दिशा-निर्देशों के बीच केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) के प्रबंध निदेशक ( MD/CEO) के पदों पर तैनाती की व्यवस्था एक बार फिर बड़े नीतिगत असमंजस और अंतर्विरोधों के घेरे में आ गई है। सहकारिता विभाग के प्रावधानों के अनुसार, सीसीबी स्तर पर प्रबंध निदेशक के पद पर राज्य सरकार के सहकारिता विभाग के संयुक्त शासन सचिव स्तर से, प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर राज्य सहकारिता सेवा के संयुक्त रजिस्ट्रार स्तर के अधिकारियों को तैनात किए जाने का प्रावधान है। वहीं दूसरी ओर, वर्षों पहले ऋण माफी (Loan Waiver) योजनाओं के दौरान सामने आई धांधलियों और प्रशासनिक गड़बड़ियों के बाद यह नीति निर्धारित की गई थी कि किसी भी अधिकारी को उसके गृह जिले (Home District) की सीसीबी में एमडी के पद पर तैनात नहीं किया जाएगा।लेकिन इन तमाम प्रावधानों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच अब अपैक्स बैंक (Apex Bank – राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक) ने संबंधित केंद्रीय सहकारी बैंकों के स्तर से बैंक में प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर आरबीआई से मंजूरी प्राप्त करने के संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं।

आरबीआई (RBI) के ‘फिट एंड प्रॉपर’ (Fit and Proper) मानदंडों पर भारी पड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक नियुक्तियां, कई जिलों में सीईओ (CEO) नहीं योग्य!

राज्य के केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) में प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के पदों पर तैनाती को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित ‘फिट एंड प्रॉपर’ (Fit and Proper) मानदंड कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। अपैक्स बैंक द्वारा नाबार्ड (NABARD) और आरबीआई (RBI) के निर्देशों के तहत हाल ही में जारी 30 सितंबर 2026 तक की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, अजमेर, बूंदी, जैसलमेर, हनुमानगढ, झुंझुनूं, भरतपुर, नागौर, पाली, सीकर और टोंक सहित कई महत्वपूर्ण जिलों के सहकारी बैंकों में तैनात सीईओ (CEO) आरबीआई के मानदंडों (विशेषकर न्यूनतम 8 वर्ष का अनिवार्य बैंकिंग अनुभव या शैक्षणिक योग्यता) पर पूरी तरह ‘अयोग्य’ (No) पाए गए हैं।वर्षों पहले ऋण माफी में हुई धांधलियों के बाद गृह जिले में पदस्थापना न करने जैसे सख्त नीतिगत निर्णय कागजी साबित हो रहे हैं, क्योंकि जब नियुक्त अधिकारी आरबीआई के कड़े मापदंडों पर ही खरे नहीं उतरते, तो बैंकों की वित्तीय सेहत (Financial Health) और पारदर्शिता (Transparency) रामभरोसे ही चल रही है। सहकारिता विभाग की प्रतिनियुक्ति की पुरानी ढर्रे वाली व्यवस्था और आरबीआई के कड़े विनियामक नियमों (Regulatory Rules) के बीच तालमेल के अभाव ने इन वित्तीय संस्थाओं की साख को संकट में डाल दिया है, जिस पर विभाग के नीति-निर्माताओं को गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

विडंबना यह है कि एक तरफ नियुक्तियां सहकारिता विभाग द्वारा प्रशासनिक संवर्ग से की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ आरबीआई के ‘फिट एंड प्रॉपर’ (Fit and Proper) मानदंडों और अनुमोदित बैंक ढांचे (Approved Bank Structure) के बीच यह पत्राचार व्यवस्था सहकारिता तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।हाल ही में अपैक्स बैंक द्वारा जारी ताजा सूची और आंकड़ों पर गौर करें, तो राज्य के कई केंद्रीय सहकारी बैंकों में तैनात कई सीईओ (CEO) आरबीआई के तय मानकों (जैसे 8 वर्ष का बैंकिंग अनुभव आदि) पर खरे नहीं उतर रहे हैं, जिससे पूरी चयन और प्रतिनियुक्ति प्रक्रिया पर व्यावहारिक संकट खड़ा हो गया है। सहकारिता विभाग के नीतिगत प्रश्नों के उत्तर और बैंक सदस्यों के अधिकारों के दावों के बीच यह असमंजस इस बात का प्रमाण है कि विभाग बिना पुख्ता समन्वय के कागजी घोड़े दौड़ा रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर प्रशासनिक औचित्य तार-तार हो रहा है।

 

अपैक्स बैंक (Apex Bank) का अल्टीमेटम: आरबीआई की अनुमति और डेटा संशोधन के नाम पर सीसीबी (CCBs) बैंकों में मचा हड़कंप

राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (एपैक्स बैंक) द्वारा सभी केंद्रीय सहकारी बैंकों को जारी ताजा पत्रों ने सहकारिता महकमे में खलबली मचा दी है। अपैक्स बैंक की उप महाप्रबंधक (आयोजना एवं विकास – Planning & Development) द्वारा जारी आदेश में बैंकों से 31 अक्टूबर 2026 तक की स्थिति में यदि कोई संशोधन हो, तो उसे तत्काल ईमेल (Email) के जरिए भेजने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, नाबार्ड के 3 जुलाई 2024 के उस नवीन पत्र का हवाला भी मांगा गया है, जिसमें आरबीआई की पूर्व अनुमति (Prior Approval) लिए जाने की अनिवार्यता की कड़ी अनुपालना सुनिश्चित करने को कहा गया है।दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ सहकारिता विभाग अपने स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों को प्रबंध निदेशक के रूप में थोपता है, वहीं दूसरी तरफ आरबीआई के अनुमोदन (Approval) और नाबार्ड के दिशा निर्देशों (Guidelines) की आड़ में बैंकों से स्पष्टीकरण तलब किए जा रहे हैं। बैंक सदस्यों के अधिकारों और विभाग के नीतिगत उत्तरों के बीच पिस रहे इन केंद्रीय सहकारी बैंकों के पास अब तय समय सीमा में शून्य (Nil) या संशोधित रिपोर्ट भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। यह पत्राचार इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार राज्य के सहकारी ढांचे में समन्वय की भारी कमी के कारण हर स्तर पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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