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बाड़मेर सेंट्रल को ऑपरेटिव बैंक: कभी राष्ट्रीय स्तर पर था सिरमौर, आज लचर वसूली तंत्र और प्रशासनिक उदासीनता से हांफ रहा त्रिस्तरीय ढांचा…?

सार

लचर वसूली और प्रशासनिक लापरवाही के कारण कभी नाबार्ड से पुरस्कृत बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) की वित्तीय सेहत गंभीर दौर से गुजर रही है। बैंक की 20 शाखाओं में 153.79 करोड़ रुपये से अधिक के फसली ऋण अवधिपार (Overdue) हो चुके हैं।

विस्तार

 ​बाड़मेर | सहकारी जगत ग्राउंड विशेष रिपोर्ट | 30 अक्टूबर|सीमावर्ती बाड़मेर जिले में सहकारी आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले केंद्रीय सहकारी बैंक लिमिटेड (CCB) की वित्तीय सेहत आज गंभीर दौर से गुजर रही है। कभी अपनी उत्कृष्ट कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन के दम पर नाबार्ड (NABARD) तथा केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोत्तम कार्य के लिए पुरस्कृत होने वाला यह बैंक आज प्रशासनिक उदासीनता और लचर वसूली तंत्र के कारण हांफता नजर आ रहा है। जिले के त्रिस्तरीय ढांचागत सहकारी तंत्र—जिस पर ग्रामीण अंचल के किसानों को सबसे पुरानी और भरोसेमंद वित्तीय ऋण सेवाएं देने की जिम्मेदारी है—उसकी स्थिति वर्तमान में काफी दयनीय हो चुकी है।उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विभिन्न शाखाओं में बकाया अवधिपार (Overdue) फसली ऋणों का कुल आंकड़ा 1 अरब 53 करोड़ 78 लाख 87 हजार 20 रुपये तक पहुंच गया है। बैंक की विभिन्न शाखाओं, , धोरीमन्ना (16 करोड़ 55 लाख 7 हजार 735 रुपये / 16.55 करोड़), चौहटन (25 करोड़ 86 लाख 5 हजार 775 रुपये / 25.86 करोड़), शिव (32 करोड़ 21 लाख 55 हजार 430 रुपये / 32.22 करोड़), तथा गडरारोड (12 करोड़ 90 लाख 54 हजार 544 रुपये / 12.91 करोड़), के.यू.एम. (KUM) (11 करोड़ 16 लाख 83 हजार 861 रुपये / 11.17 करोड़) और सेड़वा (18 करोड़ 6 लाख 73 हजार 793 रुपये / 18.07 करोड़) समेत कुल 20 शाखाओं में 37,533 खातों के माध्यम से करोड़ों रुपये की राशि अवधिपार (Overdue) रूप से अटकी पड़ी है।

पैक्स (PACS) स्तर पर मनमानी और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं से घिरा सहकारिता ढांचा

बाड़मेर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) से जुड़ी ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स – PACS) और अधीनस्थ संस्थानों में कुप्रबंधन (Mismanagement) का आलम यह है कि प्रशासनिक अकुशलता के कारण नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जिले के पैक्स (PACS) संस्थानों में व्यवस्थापकों की नियुक्तियों और कार्यप्रणाली को लेकर मनमानी अपनी चरम सीमा पर है। इसका ताजा उदाहरण सितंबर माह में देखने को मिला, जब रतनपुरा ग्राम सेवा सहकारी समिति से व्यवस्थापक के सेवानिवृत्त होने के बाद से आज दिन तक समिति के निर्वाचित संचालक बोर्ड द्वारा विधिवत रूप से पारित प्रस्ताव और निर्णय के बावजूद नया व्यवस्थापक नियुक्त नहीं किया जा सका है।एक तरफ जहां वैध नियुक्तियां अटकी पड़ी हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर हो रहे लचर फैसलों के कारण विभाग की आए दिन किरकिरी हो रही है। गत दिनों नियम-विरुद्ध तरीके से किए गए डंडाली पैक्स (PACS) व्यवस्थापक के निलंबन आदेश पर राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) द्वारा स्थगन (Stay) आदेश दिए जाने से बैंक में प्रतिनियुक्ति पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। न्यायालय से स्थगन (Stay) मिलने के बाद से सहकारिता महकमे में बैठे अफसरों की भारी फजीहत हो रही है। जानकारों का मानना है कि जब तक पैक्स (PACS) स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप बंद कर पारदर्शी और कुशल कार्मिकों की तैनाती नहीं की जाएगी, तब तक त्रिस्तरीय सहकारी ढांचे की वित्तीय सेहत में सुधार होना नामुमकिन है। ग्रामीण इलाकों के किसानों को अपनी छोटी-छोटी वित्तीय जरूरतों और कृषि कार्यों के लिए पैक्स (PACS) के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, लेकिन व्यवस्थापकों के पदों पर अनिर्णय की स्थिति और अदृश्य खींचतान के चलते सहकारिता का मूल उद्देश्य ही धूमिल होता जा रहा है।

इसके अलावा, बैंक द्वारा गोपाल क्रेडिट कार्ड (Gopal Credit Card) योजना के तहत वितरित करोड़ों रुपये की ऋण राशि भी समय पर वसूल न होने के कारण बैंक की वित्तीय स्थिति पर भारी पड़ रही है।वर्तमान परिदृश्य (Scenario) में स्थिति यह है कि राज्य सरकार द्वारा प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर तैनात राजस्थान सहकारिता सेवा ( Rajasthan Cooperative Service) के अधिकारियों ने बैंक के कामकाज और प्रशासनिक नियंत्रण (Administrative Control) को इस कदर पंगु बना दिया है कि सीसीबी (CCB) का पूरा वसूली तंत्र (Recovery Mechanism) चरमरा गया है। बैंक में उच्च पदों पर बैठे अधिशाषी अधिकारियों (Executive Officers) ने ऋण वसूली के कार्य से लगभग पूरी तरह किनारा कर लिया है। धरातल पर ऋण वितरित करने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स – PACS) में भी अकुशल प्रबंधन और प्रशासनिक सुस्ती हावी है। पैक्स (PACS) स्तर पर स्वायत्तशासी निकायों की आड़ लेकर फसली ऋणों का वितरण तो कर दिया गया, लेकिन उनकी रिकवरी (Recovery) के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिसके परिणामस्वरूप बैंक की पूंजी लंबे समय से अवधिपार (Overdue) होकर फंस गई है।हालत यह है कि जोधपुर खंड (Jodhpur Division) में अतिरिक्त रजिस्ट्रार (Additional Registrar) के पद पर तैनात स्थानीयकृत अधिकारियों ने भी कभी गंभीरता दिखाते हुए ऋण वसूली और ऋण वितरण की समीक्षा (Review) करने की जहमत नहीं उठाई। नतीजा यह है कि कभी किसानों की आर्थिक प्रगति का मुख्य आधार रहा यह सहकारी बैंक आज नौकरशाही की लाचारी और कुप्रबंधन (Mismanagement) का शिकार बनकर रह गया है, जिससे सहकारिता से जुड़े आम किसानों में भारी रोष व्याप्त है।

 बैंक की कोर योजनाओं (Core Schemes) में अनदेखी: गोपाल क्रेडिट कार्ड (Gopal Credit Card) और ऋण वसूली पर संकट के बादल

सीमावर्ती बाड़मेर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक लिमिटेड (CCB) द्वारा संचालित योजनाओं, विशेषकर गोपाल क्रेडिट कार्ड (Gopal Credit Card) योजना और फसली ऋणों की वसूली की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। बैंक की कुल 20 शाखाओं के अंतर्गत वर्तमान में कुल 37,533 खातों में 1,53,78,87,020 रुपये (लगभग 153.79 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम राशि अवधिपार (Overdue – OD) चल रही है, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बैंक का मैदानी वसूली तंत्र (Recovery Mechanism) पूरी तरह से फेल हो चुका है। शिव शाखा में सर्वाधिक 32.21 करोड़ रुपये, चौहटन में 25.86 करोड़ रुपये, सेड़वा में 18.07 करोड़ रुपये, धोरीमन्ना में 16.55 करोड़ रुपये और गडरारोड शाखा में 12.91 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अटकी हुई है, जिससे बैंक के दैनिक वित्तीय लेन-देन (Transactions) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।सरकारी स्तर पर पशुपालकों और किसानों की आय बढ़ाने के लिए शुरू की गई गोपाल क्रेडिट कार्ड (Gopal Credit Card) जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के तहत बाड़मेर जिले में बड़े पैमाने पर ऋण वितरित तो किए गए, परंतु मॉनिटरिंग (Monitoring) और मैदानी समीक्षा (Field Review) के अभाव में ये ऋण भी समय पर वापस नहीं लौट रहे हैं। बैंक में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर तैनात अधिकारियों और प्रबंधकों की उदासीनता के कारण बकायेदारों के खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई (जैसे कुर्की या आरसी – Recovery Certificate जारी करना) अमल में नहीं लाई जा रही है। सहकारिता विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा समय-समय पर समीक्षा बैठकें (Review Meetings) न करने और फील्ड विजिट (Field Visit) से दूरी बनाए रखने के कारण पैक्स कर्मियों के हौसले पस्त हैं। यदि समय रहते इन करोड़ों रुपये के फंसे हुए कर्जों (एनपीए – NPA व अवधिपार ऋण – Overdue Loans) की सुनियोजित और कड़ी रिकवरी (Recovery) नहीं की गई, तो एक समय किसानों के वित्तीय संबल का पर्याय रहा यह बैंक अपनी साख पूरी तरह खो देगा और दिवालियापन (Bankruptcy) के कगार पर आ जाएगा।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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