सार
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में पैक्स-लैम्पस को 3% सर्विस चार्ज नहीं मिलने से ग्राम सेवा सहकारी समितियां गंभीर आर्थिक संकट और बकाया वेतन की मार झेल रही हैं, जबकि विभागीय आदेश केवल कागजों तक सीमित हैं।
विस्तार 
जयपुर/जोधपुर/बाड़मेर: |सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट (Ground Report) – 29 अक्टूबर |प्रदेश में कृषि विभाग (Agriculture Department) और राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (State Level Bankers’ Committee ) द्वारा खरीफ 2026 से रबी 2026-27 तक के दो फसल मौसमों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की अधिसूचनाएं जारी कर व्यापक प्रचार-प्रसार के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन इस चमकदार प्रचार तंत्र और कागजी दिशा-निर्देशों (Guidelines) के पीछे एक कड़वा सच यह है कि त्रि-स्तरीय सहकारी ढांचे की रीढ़ कही जाने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियां (पैक्स/लैम्पस – PACS/LAMPS) लंबे समय से फसल बीमा पॉलिसियों के सृजन में अपने वित्तीय संसाधन झोंककर गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही हैं।योजना के नियमों (Rules) के अनुसार, बीमा कंपनियों द्वारा बैंकों को कृषकों से प्राप्त प्रीमियम (Premium) पर 4 प्रतिशत सर्विस चार्ज (Service Charge) दिया जाता है, जिसमें से नियमानुसार 3 प्रतिशत हिस्सा पैक्स/लैम्पस को मिलना चाहिए। इसके बावजूद, धरातल पर स्थिति यह है कि इस बार भी विभागीय स्तर से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सर्विस चार्ज देय का प्रावधान जारी व अधिसूचित किया जाता है, लेकिन एक दशक से जोधपुर खंड में विशेषाधिकार के तहत जोधपुर केंद्रीय सहकारी बैंक इस राशि के आवंटन पर कुंडली मारकर बैठा है।
कागजी आदेशों तक सिमटी सहकारिता महकमे की चेतावनी, पैक्स-लैम्पस (PACS-LAMPS) को हक के लिए करना पड़ रहा संघर्ष
सहकारिता विभाग और पंजीयक कार्यालय द्वारा समय-समय पर पैक्स और लैम्पस की समस्याओं के निराकरण के लिए कड़े आदेश जारी करने का दावा किया जाता है, लेकिन धरातल पर इनका असर शून्य नजर आता है। विभाग द्वारा पूर्व में अतिरिक्त रजिस्ट्रार स्तर से स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बैंकों को मिलने वाले 4 प्रतिशत सर्विस चार्ज में से 3 प्रतिशत राशि तत्काल संबंधित पैक्स/लैम्पस को दी जाए तथा बीमा कंपनी से भुगतान मिलने के 7 दिवस के भीतर यह राशि सुनिश्चित की जाए। इसके अलावा, एरियर (Arrears) ब्याज की अवैध वसूली और ऑनलाइन पोर्टल (Online Portal) के माध्यम से काटी गई हिस्सा राशि को लौटाने के भी निर्देश थे। परन्तु केंद्रीय सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं हुआ है और विभागीय आदेश केवल फाइलों और कागजों की शोभा बढ़ाकर रह गए हैं। नतीजा यह है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाली सहकारी समितियां वित्तीय बदहाली की मार झेल रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे हैं।
इसके परिणामस्वरूप, जालोर, बाड़मेर, सिरोही तथा पाली सीसीबी (CCB) कार्यक्षेत्र की ग्राम सेवा सहकारी समितियों में इस योजनांतर्गत प्रावधान होने के बावजूद लाखों की राशि अटकी हुई है। ग्राम सेवा सहकारी समितियों स्तर का यूनियन नेतृत्व इस योजनांतर्गत देय सर्विस चार्ज राशि के आवंटन को लेकर मांग उठाकर थक चुका है, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। सहकारिता विभाग द्वारा पूर्व में जारी किए गए आदेश महज कागजी कार्रवाई बनकर रह गए हैं, जिनकी केंद्रीय सहकारी बैंकों और कृषि विभाग स्तर पर लगातार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।जैसलमेर के मोहनगढ़ सहित कई शाखाओं के अधीनस्थ पैक्स व्यवस्थापकों ने इस बाबत लिखित पीड़ा व्यक्त की है कि जहां कुछ शाखाओं में यह राशि प्राप्त भी हुई है, वहीं कई जगहों पर समितियों के बचत खातों (Savings Accounts) में आज तक बीमा सर्विस चार्ज की राशि और उसका भुगतान आदेश (Payment Order – PO) तक प्राप्त नहीं हुआ है। हालत यह है कि समितियों के व्यवस्थापक महीनों के बकाया वेतन और आर्थिक संकट के बीच बिना किसी प्रशासनिक सहयोग के जमीनी स्तर पर बीमा और ऋण (Loan) वितरण के कार्य को खींचने को विवश हैं। एक तरफ सरकार व बैंकिंग तंत्र विज्ञापनों के माध्यम से योजना के सफल क्रियान्वयन (Implementation) का ढिंढोरा पीट रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी (निचले) स्तर की संस्थाएं अपने हक के सर्विस चार्ज और बुनियादी वित्तीय अधिकारों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
सीसीबी मे कई शाखाओं में बीमा सर्विस चार्ज और बकाया वेतन पर चुप्पी, वित्तीय संकट से जूझ रहे व्यवस्थापक

जैसलमेर:जिले की सीसीबी के अंतर्गत आने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों ने बैंक प्रबंधन की लचर कार्यशैली के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए गंभीर समस्याएं उठाई हैं। समितियों के सामने स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा सर्विस चार्ज की राशि अभी तक कई समितियों के बचत खातों में अंतरित (Transfer) नहीं की गई है, और न ही इसका कोई आधिकारिक भुगतान आदेश (Payment Order ) जारी हुआ है। इसके साथ ही, समितियों के सामने इस योजना के क्रियान्वयन यानी ऋणी सदस्य के पॉलिसी सृजन (Policy Generation) में समिति स्तर पर मानव संसाधन (Manpower) और संसाधन व्यय को लेकर वित्तीय संकट खड़े हो गए हैं। सीमित आय वाली जैसलमेर जिले की सहकारी समितियों में हालात यह हैं कि व्यवस्थापकों का 6 महीने से लेकर 1 वर्ष तक का वेतन बकाया पड़ा है, जिसके कारण उनके समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। किसानों के बचत खातों से ऋण समायोजन (Loan Adjustment), एमसीएल (Maximum Credit Limit ) के बैकहैंड (Back-end) नवीनीकरण और बीसी (Business Correspondent ) खातों के लम्बे समय से अटके भुगतानों को लेकर व्यवस्थापकों द्वारा बार-बार गुहार लगाने के बावजूद बैंक स्तर पर कोई ठोस समाधान नहीं किया जा रहा है, जिससे सहकारी तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है।


