सार
सहमतियों के बाद भी पैक्स-लैम्प्स कर्मचारियों की मांगें पूरी न होने से संयुक्त संघर्ष समिति में इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है। वित्तीय संकट से जूझते इस तंत्र में अब कर्मचारियों के साथ-साथ ‘सहकारी संस्थाओं के सर्वांगीण हित’ को प्राथमिकता देने वाले एक नए विकल्प की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
विस्तार

जयपुर | सहकारी जगत रिपोर्ट्स | 2 नवंबर |सहकारी आंदोलन के त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र की सबसे मजबूत और प्राथमिक कड़ी—पैक्स (PACS) एवं लैम्प्स (LAMPS ) के कर्मचारियों के हक और हित की लड़ाई एक बार फिर प्रशासनिक उदासीनता और आंतरिक गुटबाजी की बलि चढ़ती दिख रही है। कर्मचारियों के अधिकारों के लिए गठित ‘राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति’ में अब नेतृत्व पदों से इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है।हाल ही में सोशल मीडिया (Social Media) के माध्यम से संघर्ष समिति के विभिन्न पदाधिकारियों ने पदों से अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी है। वहीं, मारवाड़ प्रांत से जुड़े दो दिग्गज नेतृत्व ने भी समिति से किनारा कर लिया है। वर्तमान परिदृश्य (Current Scenario) में प्रदेश में पैक्स-लैम्प्स कार्मिकों के मुख्य रूप से चार से पांच संगठनात्मक नेतृत्व कार्यशील बताए जाते हैं। इनमें से वर्ष 2024-25 में उदित ‘राजस्थान बहुउद्देशीय सहकारी सोसायटी कर्मचारी यूनियन’ व ‘राजस्थान सहकारी विकास मंच’, तथा पूर्व से सक्रिय ‘राजस्थान सहकारी कर्मचारी संघ (भामसा)’ प्रमुख हैं। इन तीनों को मिलाकर ही इस संघर्ष समिति का गठन किया गया था।
अतीत से सबक: आश्वासनों में उलझता रहा संगठनात्मक इतिहास
पैक्स और लैम्प्स कर्मचारियों का संगठनात्मक संघर्ष नया नहीं है, लेकिन हर बार बड़े आंदोलनों का अंत निराशाजनक परिणामों पर होना कार्मिकों के लिए चिंता का विषय रहा है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 2012-13 में जब ‘राजस्थान सहकारी साख समिति एंप्लॉइज यूनियन’ के बैनर तले राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक) के समक्ष अर्द्ध-नग्न प्रदर्शन जैसा उग्र आंदोलन किया गया, तब भी कर्मचारियों को कोई ठोस परिणाम हासिल नहीं हुआ और कार्मिकों का संगठन से मोहभंग हो गया।इसके बाद वर्ष 2015 से ‘राजस्थान सहकारी कर्मचारी संघ’ के प्रति कर्मचारियों का रुझान तेजी से बढ़ा और 2020 तक यह संगठन मजबूती से स्थापित रहा। हालांकि, दिग्गज नेता नंदलाल वैष्णव की सेवानिवृत्ति के बाद संगठन में बिखराव आया और दो नए संगठनात्मक ढांचों का जन्म हुआ। बावजूद इसके, अव्यावहारिक मांगों, नीतियों और सहकारिता के मूल सिद्धांतों से भटकाव के कारण परिणाम शून्य ही रहे।पैक्स-लैम्प्स मूलतः स्वायत्तशासी निकाय (Autonomous Bodies) हैं, जहां नियोक्ता और नियोजन का ढांचा अन्य सरकारी विभागों से भिन्न है। लेकिन नीतिगत स्पष्टता के अभाव में अपेक्स बैंक और सहकारिता विभाग के बीच कर्मचारियों की फाइलें दबकर रह जाती हैं। विगत एक दशक का यह इतिहास दर्शाता है कि जब-जब नेतृत्व में बिखराव आया है, तब-तब जमीनी कर्मचारियों की वेतनमान और स्थायीकरण जैसी जायज मांगें ठंडे बस्ते में गई हैं।
गौरतलब है कि इस संघर्ष समिति के बैनर तले बीते मार्च माह में नेहरू सहकार भवन के समक्ष विशाल एक दिवसीय धरना दिया गया था, जिसके बाद लगातार दो माह तक आंदोलन चला। शासन-प्रशासन के साथ हुई वार्ता में सहमति बनने के बावजूद आज तक कार्मिकों की एक भी मांग पूरी नहीं हो सकी है। वित्तीय वर्ष में करोड़ों रुपये का आयकर (Income Tax) चुकाने वाली केंद्रीय सहकारी बैंकों और अपेक्स बैंक (Apex Bank) की मजबूत स्थिति के विपरीत, धरातल पर सहकारिता की नींव कहे जाने वाले पैक्स-लैम्प्स कार्मिक आज भी अपने नियमित वेतनमान के लिए तरस रहे हैं। सरकार की ब्याज-मुक्त ऋण योजना, लंबित ब्याज अनुदान का आवंटन न होना, घटते संसाधन और फसली ऋण व्यवसाय में मिलने वाली महज 2 प्रतिशत (ब्याज अनुदान) जैसी अव्यावहारिक नीतियों ने समितियों की वित्तीय स्थिति बिगाड़ दी है।अब वर्तमान परिदृश्य में निराशाजनक परिणामों के बीच एक नए संगठनात्मक नेतृत्व की सुगबुगाहट तेज हो गई है। खास बात यह है कि इस बार नया विकल्प केवल कर्मचारियों के व्यक्तिगत हितों तक सीमित रहने के बजाय सहकारी आंदोलन और सहकारी संस्थाओं के सर्वांगीण हित को प्राथमिकता देने की दिशा में रूपरेखा (Framework) तैयार कर रहा है।
वित्तीय संकट में प्राथमिक समितियां, कैसे मिले कर्मचारियों को वेतन?

सहकारिता तंत्र में जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और अपेक्स बैंक हर साल करोड़ों रुपये का शुद्ध मुनाफा (Net Profit) कमाते हुए भारी-भरकम आयकर चुका रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस तंत्र की नींव यानी पैक्स और लैम्प्स वित्तीय बदहाली के दौर से गुजर रही हैं। राज्य सरकार की फ्लैगशिप (Flagship) ‘ब्याज-मुक्त अल्पकालीन फसली ऋण योजना’ का सारा दारोमदार इन्हीं प्राथमिक समितियों पर निर्भर है, लेकिन इसके एवज में समितियों को मिलने वाली महज 2 प्रतिशत राशि (कमीशन) उनके प्रशासनिक व परिचालन खर्चों (Operational Expenses) को पूरा करने के लिए भी अपर्याप्त है।समितियों के पास अपने संसाधन लगातार घट रहे हैं। सरकार की ओर से मिलने वाला ब्याज अनुदान (इंटरेस्ट सबवेंशन – Interest Subvention) महीनों तक अटका रहता है। समय पर आवंटन न होने से समितियों की तरलता (लिक्विडिटी – Liquidity) समाप्त हो जाती है, जिसका सीधा असर वहां कार्यरत कर्मचारियों के वेतन पर पड़ता है।कई जिलों में पैक्स कार्मिकों को महीनों तक वेतन नसीब नहीं होता। जानकारों का मानना है कि जब तक पैक्स-लैम्प्स को स्वायत्तशासी निकाय के रूप में वित्तीय रूप से सक्षम नहीं बनाया जाएगा और प्रतिपूर्ति की दर में व्यावहारिक बढ़ोतरी नहीं होगी, तब तक न तो संस्थाएं बचेंगी और न ही कार्मिकों के हित सुरक्षित रह पाएंगे। यही कारण है कि अब नए नेतृत्व का जोर केवल मांग-पत्र सौंपने के बजाय संस्थागत सुधारों पर केंद्रित दिख रहा है।
> मांगें पूरी न होने से रोष: संघर्ष समिति के समझौतों के बाद भी वेतन और स्थायीकरण जैसी मांगें ठंडे बस्ते में हैं। नेतृत्व में इस्तीफों के बीच अब कर्मचारियों का संघर्ष समिति नेतृत्व से मोहभंग हो चुका है, और वे अपने हक के लिए नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।-पैक्स-लैम्प्स कार्मिकों के दृष्टिकोण से
नेतृत्व में बिखराव और नई सुगबुगाहट: आंतरिक गुटबाजी और अव्यावहारिक नीतिगत कदम के कारण संघर्ष समिति कमजोर पड़ी है। समिति पदाधिकारी अब व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सहकारी संस्थाओं के सर्वांगीण और मजबूत विकास को केंद्र में रखकर नई रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।-सहकारी समिति निर्वाचित पदाधिकारियों के दृष्टिकोण से
वित्तीय बदहाली से चिंता: अपेक्स बैंक मुनाफे में हैं, लेकिन प्राथमिक समितियां वित्तीय संकट से जूझ रही हैं। ब्याज अनुदान और घटते संसाधनों के कारण सहकारिता की नींव कमजोर हो रही है, जिससे शेयरधारकों में संस्थाओं के भविष्य को लेकर गहरी चिंता है।सहकारी संस्था शेयरधारकों के दृष्टिकोण से


