सार
राजस्थान के केंद्रीय सहकारी बैंक डिजिटल सेवाओं के विस्तार में व्यस्त हैं, लेकिन सदस्यों को लाभांश देने में नाकाम रहे हैं। 1194 करोड़ रुपये के भारी एनपीए, रिक्त पदों और आरटीआई में जानकारी न देने के रवैये ने बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विस्तार 
जयपुर |विशेष रिपोर्ट 18 अक्टूबर|राजस्थान के केंद्रीय सहकारी बैंक डिजिटल (Digital) क्रांति और नई योजनाओं का ढोल पीटने में तो अव्वल आ रहे हैं, लेकिन जब अपने ही अंशधारकों (Shareholders) और किसान सदस्यों की गाढ़ी कमाई पर लाभांश (Dividend) बांटने की बात आती है, तो पूरी व्यवस्था में सन्नाटा पसर जाता है। हाल ही में राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (Apex Bank) द्वारा जारी समीक्षा बैठक के निर्देशों ने सहकारी बैंकिंग की जमीनी हकीकत की कलई खोलकर रख दी है। बैंक प्रबंधन जहाँ एक तरफ मोबाइल बैंकिंग (Mobile Banking), यूपीआई (UPI) और आईएमपीएस (IMPS) जैसी डिजिटल (Digital) सेवाएं शुरू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और ‘प्रवाह’ पोर्टल के चक्कर काट रहा है, वहीं दूसरी ओर संस्था को खड़ा करने वाले मूल हितधारकों (Stakeholders) को लाभांश वितरण की कोई सुध नहीं ली जा रही है।सहकारी बैंकों का असली उद्देश्य अपने सदस्यों को वित्तीय संबल और उनके निवेश पर वाजिब रिटर्न (Return) देना था। परंतु स्थिति यह है कि सैकड़ों करोड़ रुपये के अवधिपार (Overdue) ऋण और बढ़ते एनपीए (Gross NPA) के बोझ तले दबे ये बैंक अब केवल सरकारी योजनाओं की खानापूर्ति के केंद्र बनकर रह गए हैं। ‘सहकार से समृद्धि’ का नारा बुलंद करने वाले अधिकारी बैठकों में समीक्षा-दर-समीक्षा तो कर रहे हैं, लेकिन मोबाइल बैंकिंग (Mobile Banking) और तकनीकी विस्तार से मिलने वाले भावी लाभों में से अंशधारकों के हक का हिस्सा कैसे सुरक्षित हो, इस पर कोई ठोस योजना पेश करने में पूरी तरह विफल रहे हैं।बैंकों की इस ढुलमुल कार्यशैली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल 5 बैंक ही मोबाइल बैंकिंग (Mobile Banking) की सुविधा दे पा रहे हैं और बाकी 10 बैंक पात्रता पूरी करने के बाद भी केवल कागजी औपचारिकताओं में उलझे हैं। अपनी जेबें खाली कर बैंक के शेयर (Share) खरीदने वाले किसान और सदस्य आज भी लाभांश की आस लगाए बैठे हैं, जबकि बैंक प्रबंधन केवल नए-नए तकनीकी मापदंडों की फाइलें दौड़ाने में मस्त है।
आरटीआई (RTI) मांगने पर ‘लोक प्राधिकारी’ (Public Authority) होने से मुकरे बैंक पारदर्शिता से परहेज: आरटीआई (RTI) का नाम सुनते ही झाड़ा पल्ला
प्रदेश के केंद्रीय सहकारी बैंक जनता और किसानों के पैसे से सहकारिता का ढांचा तो खड़ा करते हैं, लेकिन जब कोई सदस्य या नागरिक उनसे पाई-पाई का हिसाब मांगता है, तो वे सीधे कानून की ढाल बनाकर खड़े हो जाते हैं। ऐसा ही एक मामला बाड़मेर, जोधपुर, दौसा और श्रीगंगानगर के केंद्रीय सहकारी बैंकों में सामने आया है, जहाँ आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में बैंक प्रबंधन ने सूचना का अधिकार (RTI Act, 2005) के तहत जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया।बैंक प्रबंधन का कहना है कि वे राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम, 2001 के तहत पंजीकृत एक संस्था हैं और राज्य सरकार द्वारा ‘सारवान् रूप से वित्तपोषित’ (Substantially Financed) नहीं हैं। इसलिए वे धारा 2(h) के तहत ‘लोक प्राधिकारी’ (Public Authority) की श्रेणी में नहीं आते। बैंक ने उच्चतम न्यायालय और राजस्थान राज्य सूचना आयोग के पुराने फैसलों का हवाला देकर आरटीआई (RTI) आवेदन को सीधे तौर पर ‘पोषणीय नहीं’ (Not Maintainable) करार दिया।सवाल यह उठता है कि जो बैंक करोड़ों रुपये का सरकारी और सार्वजनिक धन संभालते हैं, वे पारदर्शिता (Transparency) के मामले में अचानक निजी संस्था होने का राग क्यों अलापने लगते हैं? जब लाभांश देने या सूचना देने की बारी आती है तो कानून का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन करते वक्त यही बैंक सहकारिता का सबसे बड़ा मसीहा बनने का दावा करते हैं।
करोड़ों का एनपीए (NPA) और नए सीसीबी (CCB) का अधूरा ढांचा, व्यवस्थापक पदों पर खाली कुर्सियां सहकारी तंत्र का खोखलापन: न व्यवस्थापक हैं, न नए बैंकों का ठिकाना
सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में घोषणाएं और योजनाएं तो बड़े जोर-शोर से तैयार की जाती हैं, लेकिन धरातल पर क्रियान्वयन की रफ्तार कछुए से भी धीमी है। सहकारिता विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा में यह खुलासा हुआ है कि राज्य के सहकारी बैंकों पर सितंबर माह तक कुल 1,194.43 करोड़ रुपये का सकल एनपीए (Gross NPA) चढ़ चुका है। जैसलमेर, भरतपुर, चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर और अलवर जैसे जिलों में तो एनपीए (NPA) का ग्राफ चिंताजनक रूप से बढ़ा है।एक तरफ खरीफ और रबी फसलों का 350 करोड़ रुपये से अधिक का अल्पकालीन ऋण अवधिपार (Overdue) पड़ा है, तो दूसरी ओर व्यवस्थापकीय ढांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है। कई पैक्स (PACS) और सीएससी (CSC) सेंटरों पर व्यवस्थापक तथा सहायक व्यवस्थापक के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं, जिससे दैनिक कामकाज ठप पड़ा है।इतना ही नहीं, नए गठित केंद्रीय सहकारी बैंकों (जैसे बालोतरा, डीडवाना-कुचामन, प्रतापगढ़ और फलोदी – CCBs) के गठन की सूचनाएं और जमीनी ढांचा अब तक शीर्ष बैंक को पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। खाली कुर्सियों, बकाया ऋणों की वसूली में नाकामी और नए बैंकों के अधूरे गठन के बीच यह सवाल खड़ा होना लाजमी है कि जब बुनियादी ढांचा ही जर्जर है, तो फिर सहकारिता का विकास केवल फाइलों तक ही सीमित क्यों न रहे?


