सार
रानीवाड़ा कॉ-ऑपरेटिव मार्केटिंग सोसायटी द्वारा चार वर्षों की साधारण सभा एक साथ आयोजित करने से सहकारिता की प्रशासनिक कार्यकुशलता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिससे वित्तीय नियंत्रण कमजोर हो रहा है।
विस्तार 
जालोर |सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट 17 सितंबर |सहकारी आंदोलन (Cooperative Movement) को ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) की रीढ़ माना जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता (Transparency), लोकतांत्रिक मूल्यों (Democratic Values) का पालन और किसानों व आम उपभोक्ताओं को वित्तीय रूप से सशक्त बनाना है। लेकिन, वर्तमान कार्य-परिदृश्य इस बात की गवाही दे रहा है कि सहकारिता के ये मूल स्तंभ किस प्रकार प्रशासनिक सुस्ती और उदासीनता की भेंट चढ़ रहे हैं। स्थिति यह है कि अब वार्षिक साधारण सभाएं हर साल आयोजित होने के बजाय दो, तीन या चार साल की एक साथ एक ही दिन में सिमटकर रह गई हैं।
विश्लेषण से सामने आए रानीवाड़ा कॉ-ऑपरेटिव मार्केटिंग सोसायटी लिमिटेड (Raniwara Cooperative Marketing Society Limited) के ताज़ा उदाहरण ने इस व्यवस्था की पोल खोल दी है, जहाँ एक साथ चार वर्षों की साधारण सभा का आयोजन किया जा रहा है।सवाल यह है कि जब इन संस्थानों की कमान सहकारिता सेवा (Cooperative Service) के वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारियों के हाथों में है, तब व्यवस्था इतनी बेपटरी क्यों हो गई है? सहकारिता विभाग (Cooperative Department) के कायदों के अनुसार, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के बाद संस्था की वार्षिक साधारण सभा होना अनिवार्य है, जिसमें गत वर्ष के आय-व्यय, ऑडिट रिपोर्ट (Audit Report) और भावी योजनाओं पर सदस्यों की मुहर लगती है।
लेकिन, रानीवाड़ा कॉ-ऑपरेटिव मार्केटिंग सोसायटी लि., रानीवाड़ा द्वारा जारी हालिया विज्ञप्ति के अनुसार, संस्था की दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं एवं तेरहवीं वार्षिक साधारण सभा का संयुक्त रूप से आगामी 30सितंबर 2026 को आयोजन रखा गया है। यह महज एक साधारण सभा का विलंब नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि पिछले चार वर्षों से संस्था के स्तर पर विधिवत आम सभाएं आयोजित ही नहीं की गईं। एक साथ चार वर्षों के लेखा-जोखा और एजेंडे को एक ही बैठक में निपटाने की यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता के दावों पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है।
उच्चाधिकारियों (Senior Officers) की तैनाती के बावजूद बदहाल स्थिति और प्रशासनिक कार्यकुशलता पर सवाल
इस पूरी व्यवस्था का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि इन सहकारी संस्थाओं में मुख्य व्यवस्थापक या मुख्य कार्यकारी (Chief Executive) के रूप में साधारण कार्मिक नहीं, बल्कि सहकारिता सेवा के निरीक्षक (Inspector) और सहायक रजिस्ट्रार (Assistant Registrar) स्तर के वरिष्ठ और प्रशिक्षित प्रशासनिक अधिकारी तैनात किए जाते हैं। इन अधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे सहकारिता अधिनियम (Cooperative Act) और नियमों की अनुपालना को अक्षरशः सुनिश्चित करवाएंगे। बावजूद इसके, यदि क्रेता-विक्रेता सहकारी समितियां (KVSS), उपभोक्ता होलसेल भंडार (Consumer Wholesale Stores) और केंद्रीय सहकारी बैंक (Central Cooperative Bank) स्तर पर हर साल होने वाली वैधानिक बैठकें तीन से चार साल लंबित हो रही हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक कार्यकुशलता (Administrative Efficiency) और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अधिकारियों की इस प्रकार की उदासीनता से ग्रामीण स्तर के सहकारी ढांचे को गहरा आघात पहुँच रहा है, जिससे आम किसानों और सदस्यों में रोष व्याप्त है।
एक्सपर्ट व्यू -:- पारदर्शिता (Transparency) और वित्तीय नियंत्रण (Financial Control) पर प्रहार, नौकरशाही के चंगुल में फंस रहे संस्थान
सहकारी विशेषज्ञों का मानना है कि वार्षिक साधारण सभा केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सहकारिता के लोकतांत्रिक नियंत्रण (Democratic Control) का जीवंत मंच है। जब सभाएं समय पर नहीं होती हैं, तो इसके दूरगामी और नकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। समय पर ऑडिट और साधारण सभा में बजट व खर्चों पर चर्चा न होने से वित्तीय अनियमितताओं (Financial Irregularities) की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा, आम सदस्यों को हर साल अपनी बात रखने, बोर्ड के कामकाज की समीक्षा करने और सवाल पूछने का अवसर नहीं मिल पाता, जिससे सदस्यों के अधिकारों का हनन होता है। सहयोग और सहकार के मूल मंत्र पर चलने वाले ये संस्थान धीरे-धीरे नौकरशाही (Bureaucracy) के चंगुल में फंसकर अपनी वास्तविक उपयोगिता खोते जा रहे हैं, जिस पर समय रहते प्रभावी अंकुश लगाना अत्यंत आवश्यक हो गया है ताकि सहकारी आंदोलन की गरिमा को बचाया जा सके।


