सार
उप-रजिस्ट्रार की अनुशंसा के बावजूद धारा 55 के तहत जाँच शुरू क्यों नहीं की गई? 17 अप्रैल 2026 की अंतरिम रिपोर्ट आने के बाद भी कार्रवाई न होने से अधिकारियों की नीयत पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।”
विस्तार 
जोधपुर | सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट :5 सितंबर: |राजस्थान का सहकारी आंदोलन कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ और किसानों की खुशहाली का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ करता था। एक समय ऐसा था जब जोधपुर संभाग के जालोर जिले में स्थित तिलम संघ की इकाई किसानों के संबल और आर्थिक संपन्नता की जीवंत मिसाल मानी जाती थी। लेकिन, समय के साथ विभाग के लचर और अकुशल प्रबंधन ने न सिर्फ उस जीवंत प्रतीक को समाप्त कर दिया, बल्कि तिलम संघ को पूरी तरह बंद करवाकर अंततः उसकी मिलों की नीलामी करवाकर ही दम लिया। वह ऐतिहासिक त्रासदी आज भी सहकारिता के इतिहास पर एक काले धब्बे के रूप में दर्ज है, जिसे आज के अधिकारी पूरी तरह भुला चुके हैं।
तिलम संघ की बर्बादी के पुराने सबकों को ताक पर रखकर, वर्तमान में सहकारिता विभाग के जोधपुर खंडीय कार्यालय के अंतर्गत भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के नए और डरावने अध्याय लिखे जा रहे हैं। ताज़ा मामलों के अनुसार, सिरोही और पाली जिलों में अमानक एवं निजी ब्रांड की ‘हलधर प्रोम खाद’ की खरीद के नाम पर सहकारी समितियों को लाखों-हजारों रुपये की भारी-भरकम वित्तीय हानि पहुँचाए जाने के पुख्ता प्रमाण सामने आ रहे हैं। इस गंभीर मामले की तह तक जाने के लिए, उप रजिस्ट्रार (सहकारी समितियाँ, सिरोही) द्वारा अपने कार्यालय के पत्रांक (दिनांक 17.04.2026) के तहत अतिरिक्त रजिस्ट्रार (सहकारी समितियाँ, जोधपुर खंड) को प्रेषित अंतरिम रिपोर्ट में, राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम की धारा 55 के अंतर्गत पूरे प्रकरण की गहन जाँच करवाने की स्पष्ट अनुशंसा की जा चुकी है।
इसके बावजूद, आज तक इस अधिनियम के अंतर्गत जाँच का प्रारंभ न होना एक बेहद चिंताजनक पहलू बना हुआ है। यह बात पाली और सिरोही जिलों की अधिकांश यानी पाली सीसीबी की सुमेरपुर तथा तखतगढ़ शाखा कार्यक्षेत्र की कई सहकारी समितियों की संपन्न अंकेक्षण (ऑडिट) रिपोर्ट में भी साफ झलकती है, जिसमें पिछले वर्षों में अमानक खाद की खरीद के चलते समितियों को भारी चपत लगने का पूरा सच सामने आ रहा है। इसके बावजूद, सहकारिता विभाग के जोधपुर अतिरिक्त रजिस्ट्रार खंडीय कार्यालय में बैठे जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जोधपुर संभाग में खाद खरीद मामला: जिम्मेदार अधिकारियों की लचर कार्यशैली से गर्त में जा रही हैं सहकारी संस्थाएं”
सिरोही और पाली जिलों में हुए इस बहुचर्चित खाद खरीद मामले को लेकर जब मीडिया और सरोकार से जुड़े लोगों द्वारा गहराई से पड़ताल करने का प्रयास किया गया, तो विभाग की अंदरूनी पोल खुलती नजर आई। इस पूरे मामले में जब पत्रकार प्रकाश वैष्णव द्वारा अतिरिक्त रजिस्ट्रार कार्यालय, जोधपुर से तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने के लिए दूरभाष पर संपर्क किया गया, तो वहां से किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने कोई प्रतिउत्तर या संतोषजनक जवाब देने की जहमत तक नहीं उठाई। विभागीय अधिकारियों की यह लंबी चुप्पी और लचर कार्यशैली सीधे तौर पर इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल पर पर्दा डालने का स्पष्ट संकेत दे रही है।क्षेत्र के किसानों और सहकारिता से जुड़े जानकारों का मानना है कि जोधपुर खंडीय कार्यालय में सत्ता और पद का नशा इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा है कि अधिकारियों को आम किसानों और समितियों के नुकसान की कोई परवाह नहीं है। यदि आने वाले समय में यही भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारी इसी पद पर बने रहे, तो जोधपुर संभाग की अधिकांश सहकारी संस्थाएं संचित हानि यानी संचित घाटे (Accumulated Losses) के अता-पता विहीन गर्त में चली जाएंगी। नतीजा यह होगा कि ये संस्थाएं हमेशा के लिए बंद होकर इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगी, जिसका सीधा खामियाजा इस क्षेत्र के भोले-भाले अन्नदाता को भुगतना पड़ेगा।


