Home राज्य राजस्थान सहकारिता विभाग के मनमाने फरमान से गर्त में पैक्स: चार हजार पद रिक्त, जोधपुर संभाग से लेकर पूरे प्रदेश में अन्नदाता का भरोसा दांव पर

सहकारिता विभाग के मनमाने फरमान से गर्त में पैक्स: चार हजार पद रिक्त, जोधपुर संभाग से लेकर पूरे प्रदेश में अन्नदाता का भरोसा दांव पर

सार

Rajasthan सहस्राधिक ग्राम सेवा सहकारी समितियों में व्यवस्थापकों के चार हजार रिक्त पदों से प्रदेश का सहकारिता ढांचा चरमरा गया है। प्रशासनिक हठधर्मिता और भर्ती बोर्ड की नीतियों के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों का भविष्य गंभीर संकट में है।

विस्तार

​|आंचलिक क्षेत्रों और सहकारी जगत से जुड़ी प्रमुख ग्राउंड रिपोर्ट 20 अगस्त|राजस्थान के ग्रामीण अंचल में आर्थिक सुदृढ़ता की धुरी मानी जाने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियां आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं। जोधपुर खंड से लेकर पूरे प्रदेश तक इन समितियों का संचालन व्यवस्थापकों के बिना भगवान भरोसे है। आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश भर में लगभग चार हजार व्यवस्थापकों के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं, जिससे न केवल इन समितियों की कार्यप्रणाली बाधित हो रही है, बल्कि अन्नदाताओं को भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

एक तरफ सरकार ग्रामीण विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर इन सहकारी संस्थाओं के कार्यालय या तो बंद मिलते हैं या फिर अतिरिक्त प्रभार के नाम पर औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।जब भी विधानसभा के पटल पर इन रिक्त पदों को भरने का मुद्दा उठता है, सहकारिता विभाग कोई ठोस समाधान देने के बजाय सहकारी भर्ती बोर्ड की आड़ लेकर पल्ला झाड़ लेता है। यह स्थिति पिछले एक दशक से बनी हुई है, जहाँ ‘रिक्त पदों पर रोक’ का हवाला देकर व्यवस्था को पंगु बना दिया गया है।

गौरतलब है कि नब्बे के दशक में भी विभाग ने इसी तरह का एक केंद्रीकृत कैडर थोपने का प्रयास किया था, जिसे राजस्थान उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक रूप से खारिज करते हुए अवैध घोषित कर दिया था। अदालतों ने स्पष्ट किया था कि समितियां स्वायत्त इकाइयां हैं और विभाग को इनके नीतिगत फैसलों या नियुक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद, वर्ष 2017 में विभाग ने भर्ती बोर्ड का नया लेबल लगाकर इन समितियों की स्वायत्तता पर फिर से प्रहार किया और भर्ती प्रक्रिया पर एकाधिकार जमा लिया। इस नीतिगत विफलता का खामियाजा आज उस किसान को भुगतना पड़ रहा है, जिसे समय पर खाद, बीज और कर्ज की सख्त आवश्यकता है। यदि विभाग ने अपनी जिद और प्रशासनिक तानाशाही को नहीं छोड़ा, तो सहकारी आंदोलन का यह सबसे पुराना और भरोसेमंद ढांचा पूरी तरह धराशायी हो जाएगा।

​नब्बे के दशक का काला इतिहास और न्यायपालिका का ऐतिहासिक चाबुक

​विभाग की इस तानाशाही का इतिहास नया नहीं है। नब्बे के दशक में भी सहकारिता विभाग ने कर्मचारी चयन को लेकर स्वायत्त ग्राम सेवा सहकारी समितियों पर एक ऐसा ही जबरिया कैडर थोपने का कुत्सित प्रयास किया था।​तथाकथित रूप से थोपी गई उस व्यवस्था के खिलाफ जब मामला न्यायपालिका की देहरी पर पहुंचा, तो राजस्थान उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए उस कैडर ऑथोरिटी को अवैध करार देकर पूरी तरह भंग कर दिया था। अदालतों ने अपने स्पष्ट फैसलों में कहा था कि:

  • ​समितियों के आय के साधन एकदम सीमित होते हैं।
  • ​इनकी स्वायत्तता सर्वोपरि है।
  • ​समितियों के कार्य-संचालन और नीतिगत मामलों में रजिस्ट्रार या विभाग को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है

​न्यायपालिका के स्पष्ट आदेशों और सहकारिता के मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों को ताक पर रखकर, वर्ष 2017 में सहकारिता विभाग ने पैक्स-लैम्पस की नीतिगत व्यवस्था में एक बार फिर पैंतरेबाजी की। इस बार ‘सहकारी भर्ती बोर्ड’ का नया लेबल लगाकर समितियों के आंतरिक संचालन पर एकाधिकार जमाने का एक और मनमाफिक और अवैध फरमान सुना दिया गया।विभाग की इस जिद का नतीजा यह निकला कि अदालती उलझनों और प्रशासनिक लालफीताशाही के बीच पिछले एक दशक से भर्तियों पर अनिश्चितकालीन ब्रेक लग गया। समितियों के पास न तो अपने स्तर पर भर्ती का अधिकार बचा है और न ही विभाग कोई ठोस पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पूरी कर पा रहा है।

​”जब समितियां स्वायत्त हैं और उनकी वित्तीय स्थिति सीमित है, तो सहकारिता विभाग अपनी प्रशासनिक नाकामियों का ठीकरा इन पर क्यों फोड़ रहा है? क्या सरकार चाहती है कि ग्रामीण अंचल का सबसे भरोसेमंद सहकारी ढांचा पूरी तरह दम तोड़ दे?”
– सहकारी विशेषज्ञों

​चार हजार रिक्त पदों से ठप ग्रामीण वित्तीय सेवाएं

​राजस्थान में कृषि बाहुल्य अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा कही जाने वाली ग्राम सेवा सहकारी समितियां वर्तमान में एक बड़े संकट का सामना कर रही हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों में व्यवस्थापकों के चार हजार से अधिक पद रिक्त होने से समितियों का कामकाज पूरी तरह ठप सा हो गया है। व्यवस्थापकों की कमी का सीधा असर खाद-बीज वितरण और फसली ऋण के समयबद्ध आवंटन पर पड़ा है।आलम यह है कि एक ही व्यवस्थापक को कई समितियों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है, जिससे वे न तो किसी एक केंद्र को पूरा समय दे पा रहे हैं और न ही किसानों की समस्याओं का निराकरण कर पा रहे हैं। इस प्रशासनिक लचर व्यवस्था का सीधा नुकसान उन किसानों को हो रहा है जो निजी साहूकारों के चंगुल से बचने के लिए सहकारी ऋण पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन रिक्त पदों को तुरंत नहीं भरा गया और विभाग ने समितियों को भर्ती का अधिकार वापस नहीं दिया, तो प्रदेश का पूरा सहकारी वित्तीय तंत्र चरमरा जाएगा।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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