सार
Jaipur : भारत सरकार की प्रस्तावित ‘मॉडल HR नीति’ पर राजस्थान के शीर्ष बैंक की बैठक से पैक्स (PACS) में केंद्रीय नियंत्रण और वित्तीय बोझ को लेकर पुराने कानूनी विवाद और सहकारी समितियां की स्वायत्तता का मुद्दा फिर गहरा गया है।

विस्तार
जयपुर । डिजिटल डेस्क । 13 अगस्त । राजस्थान के सहकारिता जगत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। सहकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS) के लिए प्रस्तावित ‘प्रारूप मॉडल मानव संसाधन नीति’ (Draft Model HR Policy) को लेकर राज्य के शीर्ष बैंक द्वारा 14 अगस्त को बुलाई गई बैठक ने सहकारी गलियारों में बहस छेड़ दी है। यह बैठक केवल एक औपचारिक चर्चा नहीं, बल्कि उन पुराने कानूनी जख्मों को कुरेदने वाली है, जिसने अतीत में राजस्थान के पैक्स-लैम्पस के ढांचागत व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। PACS के कर्मचारियों के चयन, नियुक्ति और सेवा शर्तों का मुद्दा हमेशा से विवादों के केंद्र में रहा है, जहां ‘कैडर अथॉरिटी’ का गठन और उसके बाद उच्च न्यायालय द्वारा उसे ‘अवैध’ घोषित किए जाने का लंबा इतिहास रहा है।
सहकारिता के जानकारों और रिकॉर्ड्स पर नजर डालें तो स्थिति स्पष्ट है। 1974 में दांते कमेटी की सिफारिशों के बाद एक एकीकृत सेवा व्यवस्था लागू की गई थी, जिसके तहत ‘राजस्थान क्रेडिट इंस्टीट्यूशंस कैडर अथॉरिटी लिमिटेड’ का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य PACS के प्रबंधकों की नियुक्ति और नियंत्रण करना था। लेकिन यह प्रयोग विवादों में रहा। मामला राजस्थान उच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां अदालत ने इसे सहकारिता अधिनियम की धारा 4 के उद्देश्यों के विपरीत मानते हुए ‘कैडर अथॉरिटी’ के गठन को ही अवैध घोषित कर दिया। इतना ही नहीं, रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां द्वारा जारी ‘व्यवस्थापकीय सेवा नियम, 1977’ को भी क्षेत्राधिकार से परे मान लिया गया।
अब जबकि भारत सरकार ने PACS के लिए नई मॉडल HR नीति प्रस्तावित की है, तब राज्य के शीर्ष बैंक ने आनन-फानन में सभी हितधारकों को बुलाकर इस पर मंथन का निर्णय लिया है। मुख्य सवाल यह है कि क्या नई प्रस्तावित नीति उन कानूनी बाधाओं को पार कर पाएगी, जिन्होंने पहले की व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया था? PACS की स्वायत्तता बनाम केंद्रीय नियंत्रण का यह संघर्ष फिर से सतह पर है। देखना होगा कि 14 अगस्त की बैठक में कर्मचारी यूनियनें और विभाग इस जटिल मुद्दे को किस दिशा में ले जाते हैं।
क्या फिर बनेगी एक और ‘अथॉरिटी’ या मिलेगा PACS को अपना अधिकार?
PACS के लिए प्रस्तावित नई HR नीति पर मंथन के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य में नियुक्तियों का अधिकार स्थानीय समितियों के पास रहेगा या फिर से किसी केंद्रीयकृत ‘कैडर अथॉरिटी’ जैसी व्यवस्था को थोपा जाएगा? पूर्व में उच्च न्यायालय के निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि रजिस्ट्रार द्वारा बिना वैधानिक अधिकार के नियम थोपना और PACS पर जबरन आर्थिक भार डालना कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था। वर्तमान कर्मचारी यूनियनें अब अपनी पुरानी गलतियों से सीख लेते हुए इस बैठक में अपनी कड़ी शर्तें रखने की तैयारी में हैं, ताकि भविष्य में किसी भी प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लग सके।
व्यवस्थापक के वेतन पर ‘वित्तीय खींचतान’, क्या फिर होगा विवाद?
इतिहास गवाह है कि PACS कार्मिक के वेतन भुगतान और उनके लिए बनाए गए ‘वेतन कोष’ ने सहकारिता विभाग और समितियों के बीच हमेशा दरार पैदा की है। पिछली व्यवस्थाओं में PACS को मजबूर किया गया था कि वे इन नियुक्त कार्मिकों का वेतन वहन करें, जिसका समितियों ने तीखा विरोध किया था। अदालत ने भी माना था कि रजिस्ट्रार के पास समितियों पर ऐसे फंड का बोझ डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अब प्रस्तावित मॉडल नीति के तहत वित्तीय प्रावधान क्या होंगे, यह सहकारिता के भविष्य के लिए सबसे संवेदनशील बिंदु होगा, जिस पर कर्मचारियों और बैंक प्रशासन के बीच टकराव तय माना जा रहा है।


