Home जोधपुर जोधपुर खंड में सहकारी फसली ऋण वितरण का सच: कागजी दावों और पोर्टल प्रणाली के मकड़जाल में उलझा सहकारी आंदोलन का त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र

जोधपुर खंड में सहकारी फसली ऋण वितरण का सच: कागजी दावों और पोर्टल प्रणाली के मकड़जाल में उलझा सहकारी आंदोलन का त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र

सार

FIG पोर्टल और सीसीबी की मनमानी के कारण जोधपुर खंड में नए किसानों को अल्पकालीन फसल ऋण का लाभ नहीं मिल रहा, जिससे सहकारी आंदोलन और पैक्स की स्वायत्तता खतरे में है।

विस्तार

जोधपुर| संभाग ङेस्क 28 जुलाई| राजस्थान के सहकारी आंदोलन का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान कार्य-परिदृश्य उतना ही निराशाजनक और चिंताजनक बनता जा रहा है। प्रदेश में केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCB) के अधीन ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS) के माध्यम से नए किसान सदस्यों को बांटे जाने वाले अल्पकालीन फसल ऋणों की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है। जोधपुर खंड के अंतर्गत आने वाले छह जिलों— जालोर, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, जोधपुर और सिरोही—में इस वित्तीय वर्ष के खरीफ सीजन के दौरान नए किसानों को ऋण वितरण के आंकड़े इस व्यवस्था की पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं

उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय की अवमानना और FIG पोर्टल का शिकंजा

​वर्ष 2019 के पश्चात एपेक्स बैंक द्वारा लागू की गई FIG पोर्टल पद्धति ने सहकारी क्षेत्र की मूल आत्मा को ही चोट पहुंचाई है। नब्बे के दशक में राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि “सहकारी समिति की स्वायत्तता सर्वोपरि है।”​लेकिन, वर्तमान व्यवस्था में सहकारिता के नियमों और उच्च न्यायालय की उस ऐतिहासिक भावना को ताक पर रख दिया गया है। जब PACS स्तर से किसान की भूमिधारिता की उपलब्धता के आधार पर उसकी पूरी साख सीमा (MCL) स्वीकृत कर वितरक बैंक को भेजी जाती है, तब सीसीबी प्रबंधन स्तर पर नाममात्र की राशि का ही फसली ऋण मुहैया करवाया जा रहा है। यह सीधे तौर पर किसानों के अधिकारों और समितियों की स्वायत्तता पर कुठाराघात है।

आंकड़ों की जुबानी: व्यवस्था की लाचारी और खोखले दावे

​इन आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर सहकारिता तंत्र की नस-नस में फैली बीमारियां साफ नजर आती हैं:

  • जैसलमेर सीसीबी का शून्य निष्पादन (Zero Performance):जैसलमेर जिले में 7,508 किसानों ने नए ऋण के लिए पंजीकरण कराया। PACS स्तर पर 3,165 और शाखा स्तर पर 2,368 आवेदन स्वीकृत भी हुए, लेकिन जब बात वास्तविक ऋण संस्वीकृति और वितरण की आई, तो आंकड़ा महज 14 ऋणों पर सिमट गया और DMR सृजन शून्य (0) रहा। वहीं 39.94 करोड़ रुपये की भारी-भरकम साख सीमा (Mcl) की मांग के मुकाबले वितरित राशि 0 (शून्य) रही। यह जैसलमेर के किसानों के साथ एक भयंकर मजाक और सहकारिता विभाग की पूरी तरह से नाकामी को दर्शाता है।
  • जालोर और बाड़मेर की दयनीय स्थिति:जालोर सीसीबी में 13.34 करोड़ रुपये की मांग के एवज में मात्र 59 लाख रुपये (0.59 करोड़) ही स्वीकृत हुए।​बाड़मेर सीसीबी में 22.61 करोड़रुपये की बड़ी साख सीमा के मुकाबले केवल 66 लाख रुपये (0.66 करोड़) की ही राशि स्वीकृत हो पाई।यह इस बात का प्रमाण है कि कागजों में किसानों के पंजीकरण का बड़ा आंकड़ा तो दिखाया जा रहा है, लेकिन बैंकों के स्तर पर फाइलें दबा दी जाती हैं।
  • जोधपुर, पाली और सिरोही की आंशिक राहत:तुलनात्मक रूप से जोधपुर सीसीबी में 18.67 करोड़ की मांग पर 5.72 करोड़, पाली में 5.57 करोड़ पर 1.24 करोड़ और सिरोही में 5.73 करोड़ पर 1.47 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। हालांकि, ये आंकड़े भी किसानों की वास्तविक आवश्यकता और कुल स्वीकृत साख सीमा के मुकाबले बहुत कम हैं।

त्रिस्तरीय ढांचागत व्यवस्था और वर्तमान कार्य-परिदृश्य पर संकट के बादल

​सहकारिता आंदोलन का मूल आधार त्रिस्तरीय ढांचा है— शीर्ष स्तर पर अपेक्स बैंक, मध्य स्तर पर केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB), और तृणमूल स्तर पर ग्राम सेवा सहकारी समितियां (PACS)। लेकिन आज यह ढांचा ऊपर से नीचे तक तानाशाही और तकनीकी पेचीदगियों के बोझ तले दब चुका है।

  • ​पोर्टल प्रणाली बनी बाधा: FIG पोर्टल पद्धति ने पारदार्शिता लाने के नाम पर किसानों और समितियों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जहां हर स्तर पर फाइलें अटक रही हैं। समितियों के प्रस्तावों को सीसीबी स्तर पर अनावश्यक रूप से लंबित रखा जाता है।
  • ​स्वायत्तता का हनन: पैक्स समितियों को अपने स्तर पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं बचा है। बैंक प्रबंधन अपनी मनमानी और वित्तीय सीमाओं का हवाला देकर किसानों को उनकी पात्रता से मीलों दूर रख रहा है।

एक्सपर्ट व्यू -:-सुधार की सख्त जरूरत ?

यदि जोधपुर खंड के इन छह जिलों के नए किसानों को समय पर और उनकी पूरी पात्रता के अनुसार अल्पकालीन फसल ऋण नहीं मिला, तो अन्नदाता एक बार फिर महाजनों और निजी साहूकारों के चंगुल में फंसने को मजबूर हो जाएगा। सरकार और सहकारिता विभाग को चाहिए कि वे FIG पोर्टल की जटिलताओं को दूर करें, उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों की अनुपालना सुनिश्चित करते हुए PACS की स्वायत्तता बहाल करें, और सीसीबी प्रबंधनों की मनमानी पर अंकुश लगाएं, अन्यथा कागजी सहकारी का यह मॉडल किसानों के लिए केवल छलावा बनकर रह जाएगा।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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