Home राज्य राजस्थान बीमा कंपनियों की ‘चांदी’ और आपदा में क्लेम का “क्लेश” — प्रीमियम तो पूरा वसूला, पर क्लेम के नाम पर मिला ठेंगा!

बीमा कंपनियों की ‘चांदी’ और आपदा में क्लेम का “क्लेश” — प्रीमियम तो पूरा वसूला, पर क्लेम के नाम पर मिला ठेंगा!

फसल बीमा का ‘गणित’: प्रीमियम से भरी तिजोरी, क्लेम के नाम पर सिर्फ मजबूरी!

  • तिजोरी भरी, हाथ खाली: पिछले 5 वर्षों में बीमा कंपनियों के खातों में ₹26,757.63 करोड़ का भारी-भरकम प्रीमियम बरसा, लेकिन अन्नदाताओं को मुआवजे के नाम पर सिर्फ ₹18,189.16 करोड़ ही थमाए गए।
  • ​मुनाफे की बहार: कुल प्रीमियम का 32% हिस्सा (लगभग ₹8,568 करोड़) सीधा कंपनियों के मुनाफे में गया, जिससे साबित होता है कि फसल चाहे किसान की मरे, मलाई कंपनियां ही खाती हैं।
  • ​जबरन वसूली बनाम कंजूसी: बैंकों से प्रीमियम की एक-एक पाई समय पर काट ली जाती है, लेकिन जब आपदा में राहत देने की बारी आती है, तो कागजी अड़ंगों और तकनीकी पेचीदगियों का बहाना बना दिया जाता है।

​जयपुर / जोधपुर / प्रदेश डेस्क 25 जुलाई/ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के आंकड़ों की जब परतें उघड़ीं, तो खेती-किसानी के नाम पर चल रहे इस ‘कारोबार’ का ऐसा वीभत्स सच सामने आया है जिसे देखकर बीमा कंपनियों की तिजोरी की चमक और किसानों के माथे की सिलवटें दोनों साफ दिखाई देती हैं।प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत संसद में पेश किए गए ताजा आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राजस्थान में पिछले 5 वर्षों (2021-22 से 2025-26) के दौरान बीमा कंपनियों के पास प्रीमियम के रूप में जो खजाना बरसा है, उसके मुकाबले किसानों को मुआवजे के नाम पर महज ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही हाथ लगा है।

फिगर बोलते हैं: प्रीमियम बंपर, क्लेम कंजूस!

आंकड़ों की गवाही कहती है कि राजस्थान में कुल मिलाकर कुल प्रीमियम (किसानों का हिस्सा + राज्य सरकार का हिस्सा + केंद्र सरकार का हिस्सा मिलाकर) ₹26,757.63 करोड़ (लगभग 26,758 करोड़ रुपये) बीमा कंपनियों की झोली में डाला गया।इसके एवज में बीमा कंपनियों ने पूरे राज्य के किसानों को कुल मिलाकर मात्र ₹18,189.16 करोड़ का बीमा क्लेम ही वितरित किया।यानी, कुल जमा प्रीमियम के मुकाबले बीमा कंपनियों को औसत रूप से केवल 67.98% (लगभग 68%) ही क्लेम राशि के रूप में वापस चुकाना पड़ा। बाकी के 32% से अधिक यानी लगभग 8,568 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा सीधे तौर पर बीमा कंपनियों के कॉर्पोरेट खातों में समा गया। इसे कहते हैं— “फसल मरे किसान की, मौज उड़े कम्पनी की!”

आपदा किसानों की, मुनाफा कंपनियों का!

अन्नदाता आसमान की तरफ ताकता है—कभी सूखे की मार, कभी ओलावृष्टि, तो कभी बेमौसम बारिश। खेत में फसल बर्बाद होती है तो किसान कर्ज के दलदल में धंसता चला जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के इस ‘गणित’ में बीमा कंपनियों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। प्रीमियम की एक-एक पाई बैंकों से सीधे काट ली जाती है, चाहे फसल उगी हो या पूरी तरह चौपट हो गई हो। और जब क्लेम देने की बारी आती है, तो कागजी खानापूरी, गिरदावरी के पेंच और तमाम तकनीकी अड़ंगे लगाकर दावों को या तो खारिज कर दिया जाता है या फिर काट-छांट कर ऐसा सुखा दिया जाता है कि किसान खुद को ठगा सा महसूस करे।

कागजों के घोड़े और धरातल की सच्चाई

रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों की जेब से प्रीमियम खींचने का खेल तो बड़े पैमाने पर चल रहा है, लेकिन जब बात आपदा में अन्नदाता के आंसुओं को पोछने की आती है, तो बीमा कंपनियों के खजाने के दरवाजे बहुत मुश्किल से खुलते हैं। राजसमंद जैसे जिले में जहां महज 5.46% क्लेम मिला हो, या दौसा-अलवर जैसे जिलों में 17% से 23% तक ही राहत पहुंची हो, वहां इस योजना की सफलता पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। क्या बीमा कंपनियां सिर्फ मुनाफा कमाने का जरिया बनकर रह गई हैं? सरकार और प्रशासन को इस पर गंभीर चिंतन करने की सख्त जरूरत है।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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