Home स्‍पेशल अदृश्य’ सरकारी तंत्र और बेहाल अन्नदाता: बीमा पोर्टल के इंतजार में सूख रहे किसान के अरमान

अदृश्य’ सरकारी तंत्र और बेहाल अन्नदाता: बीमा पोर्टल के इंतजार में सूख रहे किसान के अरमान

सार 

#Rajasthan फसल बीमा पोर्टल शुरू न होने से किसान परेशान हैं।प्रशासनिक उदासीनता के कारण अन्नदाता की फसल सुरक्षा दांव पर लगी है।

विस्तार 

​जयपुर। |प्रदेश ङेस्क 20  जुलाई| राजस्थान के कृषि प्रधान अंचल में इस समय किसान एक ऐसी दोहरी मार झेल रहा है, जिसकी जिम्मेदारी किसी प्राकृतिक आपदा पर नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों में कैद ‘अदृश्य’ तंत्र पर है। कैलेंडर पर 20 जुलाई की तारीख दर्ज हो चुकी है, लेकिन खेतों में पसीना बहाकर फसल तैयार करने वाला अन्नदाता आज भी डिजिटल ‘कवच’—यानी फसल बीमा पोर्टल—के शुरू होने की बाट जोह रहा है। बीमा कंपनियों के साथ टेंडर की अंतहीन औपचारिकताओं में उलझा प्रशासन उस जमीनी हकीकत से कोसों दूर है, जहाँ किसान अपनी पूंजी और मेहनत को दांव पर लगाकर आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा है।जुलाई का महीना बुवाई के साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से भी निर्णायक होता है। फसल चक्र के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर जब किसान को प्राकृतिक अनिश्चितताओं से बचाव हेतु बीमा पंजीकरण की सबसे अधिक आवश्यकता है, तब विभागीय सुस्ती ने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। टेंडर प्रक्रिया का समय पर निस्तारण न हो पाना केवल एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि किसान की कमर तोड़ने वाला एक ‘अव्यावहारिक’ निर्णय है। यह प्रशासनिक जड़ता उस अन्नदाता के प्रति घोर उदासीनता को दर्शाती है, जिसकी मेहनत से प्रदेश की अर्थव्यवस्था का पहिया चलता है।

विज्ञापनों की चमक और धरातल की स्याह सच्चाई

​एक तरफ सरकार ‘हजारों करोड़ के ब्याज मुक्त ऋण’ के चमकदार विज्ञापनों से सुर्खियां बटोर रही है, तो दूसरी तरफ विधानसभा के गलियारों में ‘वित्तीय संसाधनों का अभाव’ बताकर पल्ला झाड़ा जा रहा है। विज्ञापनों की रंगीन दुनिया और सरकारी फाइलों की बदरंग हकीकत के बीच किसान पिस रहा है। सम्मान निधि के उत्सवों में भीड़ जुटाने वाला सहकारी तंत्र जब किसान के अधिकार—बीमा पोर्टल—की बात आती है, तब कृषि और वित्त विभाग की फाइलों में फाइलों का ही मोहताज बनकर रह जाता है।

एक्सपर्ट व्यु -समाधान की दरकार

​प्रश्न यह है कि क्या यह सरकार केवल विज्ञापनों, फोटो सेशन और सोशल मीडिया की ‘अदृश्य सरकार’ बनकर रह जाएगी? 20 जुलाई की समय-सीमा पार होने के बाद अब किसान के पास धैर्य की कमी है। यदि समय रहते फसल बीमा पोर्टल सक्रिय नहीं हुआ और बजट घोषणाएं धरातल पर नहीं उतरीं, तो यह न केवल कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा नुकसान होगा, बल्कि भविष्य में सरकार की कार्यप्रणाली पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देगा। वक्त आ गया है कि सरकार विज्ञापनों की चकाचौंध से बाहर निकले और अन्नदाता की सुध ले।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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