सार
Jaipur : राजस्थान में घाटे में चल रहे भूमि विकास बैंकों का केंद्रीय सहकारी बैंकों में विलय करने का कर्मचारी संगठन विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि सुधारों से भूमि विकास बैंक अब लाभ में आ रहे हैं, इसलिए विलय के बजाय स्टाफ भर्ती और आर्थिक पुनरुद्धार के उपाय किए जाएं।

विस्तार
जयपुर, 8 जून 2026 । डिजिटल डेस्क । राजस्थान में सहकारी भूमि विकास बैंकों (PLDB) के जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) में प्रस्तावित विलय को लेकर प्रदेश भर के कर्मचारी संगठनों में भारी आक्रोश है। ऑल राजस्थान को-ऑपरेटिव बैंक एम्प्लाइज यूनियन, ऑफिसर्स एसोसिएशन और सहकारी साख समितियां एम्प्लाइज यूनियन ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए इसे सहकारी बैंकिंग व्यवस्था के लिए आत्मघाती बताया है। संगठनों के प्रांतीय महासचिव सहकार नेता सूरज भान सिंह आमेरा ने मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास और नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक को पत्र लिखकर भूमि विकास बैंकों के स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने और उनके आर्थिक पुनरुद्धार की पुरजोर मांग की है।
सहकार नेता आमेरा ने बताया कि 21 मई 2026 को आयोजित राज्य सहकारी विकास समिति की बैठक में मुख्य सचिव ने नाबार्ड को भूमि विकास बैंकों की व्यवहार्यता का परीक्षण कर विलय या पुनरुद्धार पर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे। कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि जिला केंद्रीय सहकारी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं, जिनमें आम जनता की करोड़ों रुपये की जमा पूंजी सुरक्षित है। ऐसे में 909 करोड़ रुपये की संचित हानि झेल रहे गैर-बैंकिंग भूमि विकास बैंकों का इनमें विलय करना न केवल नीतिगत रूप से गलत है, बल्कि इससे केंद्रीय सहकारी बैंक भी गहरे आर्थिक संकट में फंस जाएंगे।
यूनियन ने विलय के बजाय बैंकों के प्रदर्शन में सुधार के आंकड़ों पर जोर दिया है। हाल ही में लागू की गई ‘मुख्यमंत्री अवधिपार ब्याज राहत एकमुश्त समझौता योजना’ (CM OTS) के तहत बैंकों ने 337 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड वसूली की है। वित्तीय सुधारों का परिणाम यह है कि राज्य भूमि विकास बैंक, जो वर्ष 2023-24 में 21.50 करोड़ रुपये की हानि में था, वह वर्ष 2025-26 में 40.73 करोड़ रुपये के वार्षिक लाभ में पहुंच चुका है। साथ ही, दीर्घकालीन ऋण वितरण भी 110.40 करोड़ से बढ़कर 172.95 करोड़ रुपये हो गया है। प्रदेश के 36 प्राथमिक भूमि विकास बैंकों में से अधिकांश अब लाभ की स्थिति में आ रहे हैं।

विलय के बजाय आर्थिक पुनरुद्धार और द्विपक्षीय वार्ता पर ज़ोर
कर्मचारी संगठनों ने समस्या के समाधान के लिए सरकार और नाबार्ड के समक्ष कई ठोस सुझाव रखे हैं। उन्होंने बैंकों में रिक्त पड़े पदों पर नई भर्ती करने की मांग की है, क्योंकि वर्तमान में वहां स्टाफ की क्षमता का मात्र 16 प्रतिशत हिस्सा ही कार्यरत है। इसके अलावा, नाबार्ड से 250 करोड़ रुपये का वार्षिक पुनर्वित्त (Refinance) उपलब्ध कराने और राज्य सरकार से ऋण वसूली के लिए गिरवी रखी गई भूमि की नीलामी व कुर्की पर लगी रोक को तत्काल हटाने का आग्रह किया गया है। यूनियन का मानना है कि ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन को ध्यान में रखते हुए विलय के बजाय इन उपायों को अपनाकर बैंकों को आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए। कर्मचारी संगठनों ने नाबार्ड से साफ कहा है कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले उनके साथ द्विपक्षीय वार्ता की जाए।


