सार
Barmer : बिना प्रशिक्षण, स्टाफ की कमी और भवनों के अभाव के ‘पैक्स कंप्यूटराइजेशन’ न होने पर FIG ID बंद करने के आदेश से ग्रामीण ऋण वितरण ठप होने की आशंका है। इसके साथ ही दोषपूर्ण ‘ब्याज नीति’ से समितियां वित्तीय संकट से जूझ रही हैं….!
विस्तार
बाड़मेर । डिजिटल डेस्क | 24 मई | बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक के अधिशासी अधिकारी ने एक आदेश जारी कर जिले की ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स) की एफआईजी आईडी बंद करने के निर्देश दिए हैं। आदेश के तहत ‘पैक्स कंप्यूटराइजेशन वीक’ (25 मई से 30 मई 2026) के दौरान कार्य पूर्ण न करने वाली समितियों की आईडी बंद कर दी जाएगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण वितरण का कार्य पूरी तरह ठप होने की आशंका है।
एक तरफ जहां शीर्ष बैंक और रजिस्ट्रार कार्यालय कागजी आदेश जारी कर इतिश्री कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। हालांकि, अब पैक्स कंप्यूटराइजेशन योजना के तहत डीसीटी, ईआरपी गो-लाइव और ऑन-सिस्टम ऑडिट जैसे कार्य प्रधान कार्यालय पर एक कैंप आयोजित कर करवाए जाएंगे। इसके लिए समस्त व्यवस्थापकों को आवश्यक अभिलेखों एवं रिकॉर्ड सहित उपस्थित होने के लिए निर्देशित किया गया है, जबकि नाबार्ड के निर्देशानुसार मिसिंग टूल से एंट्री की सुविधा 31 मई तक उपलब्ध है।
इस पूरी कवायद में सबसे बड़ी खामी यह है कि व्यवस्थापकों को अब तक ईआरपी डेटा एंट्री का प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) तक नहीं दिया गया है। वहीं, वर्ष 2017 के बाद से व्यवस्थापकों एवं कर्मचारियों की नई भर्ती नहीं होने के कारण एक-एक व्यवस्थापक के पास दो से तीन ग्राम सेवा सहकारी समितियों का अतिरिक्त कार्यभार है। ऐसे में बिना किसी प्रशिक्षण के, एक अकेले व्यक्ति द्वारा अपनी सोसायटी के नियमित कार्यों के अलावा तीन-तीन समितियों का पैक्स कंप्यूटराइजेशन और सभी खातों का मिलान करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
बुनियादी सुविधाओं के बिना ई-पैक्स लाइव करने का दबाव
विभाग ने पिछले साल भी कार्य को गति देने के नाम पर इसी तरह एफआईजी आईडी बंद कर दी थीं, जिसका खामियाजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में 5 लाख से अधिक किसान अवधिपार (डिफॉल्टर) की श्रेणी में आ गए। अब एक बार फिर अल्पकालीन फसली ऋण योजना को पलीता लगाने के लिए अधिकारी मुख्यालय में बैठकर मनमाने फरमान जारी कर रहे हैं। वास्तविक हकीकत यह है कि बाड़मेर जिले की 20 फीसदी से ज्यादा ग्राम सेवा सहकारी समितियों के पास स्वयं का भवन तक नहीं है, जहां कंप्यूटर और लैपटॉप सुरक्षित रखे जा सकें। इसके अलावा करीब 50 फीसदी समितियों में व्यवस्थापकों के पद रिक्त हैं। ऐसे में बुनियादी सुविधाओं और प्रशिक्षण के अभाव में बैंक प्रशासन द्वारा शत-प्रतिशत कंप्यूटराइजेशन, डेटा एंट्री और ई-पैक्स लाइव करने का दबाव बनाना जमीनी हकीकत को नजर अंदाज करना है। मूल व्यवसाय (फसली ऋण) के बेहद कम ब्याज मार्जिन पर निर्भर अधिकांश पैक्स के पास अपने दैनिक स्थापना व्यय तक के लिए बजट का भारी टोटा है।

एफआईजी पोर्टल की मनमानी: कंगाल होने की कगार पर पैक्स
पैक्स को सबसे बड़ा झटका वित्तीय मोर्चे पर लगा है, जहां एफआईजी पोर्टल की दोषपूर्ण ‘ब्याज पर ब्याज’ नीति ने समितियों को कंगाल कर दिया है। इस वर्ष 31 मार्च को चालू वसूली बकाया होने पर बैंक ने 7 प्रतिशत की दर से ब्याज राशि सीधे पैक्स के खाते में नामे (डेबिट) लिख दी। ब्याज खातों को लेकर भी कई विसंगतियां हैं; इसमें ब्याज और ऋण खाते अलग-अलग न होकर, बैंक द्वारा मुख्य ऋण खाते से ही ब्याज वसूला जा रहा है। यहां तक कि ऋण वसूली की अवधि बढ़ने के बाद जो वसूली हुई, उसका ब्याज भी बैंक पैक्स से मनमाने तरीके से वसूल रहा है। सहकारिता विभाग एवं अपेक्स बैंक के नियमानुसार इस राशि की ‘रिवर्स एंट्री’ होनी चाहिए, लेकिन आज तक एफआईजी पोर्टल से कटी हुई कोई भी राशि पैक्स को वापस नहीं मिली है।
‘ब्याज समायोजन’ से खोखली हो रही हैं समितियां
चूंकि सरकार की फसली ऋण योजना पूरी तरह ब्याज मुक्त है, इसलिए न तो किसान इस अतिरिक्त ब्याज का भुगतान करेंगे और न ही सरकार इसके लिए उत्तरदायी होगी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पैक्स के खाते पर जो ब्याज थोप दिया गया है, उसका पुनर्भुगतान समितियां अपने खाली खजाने से कैसे और कहां से करेंगी? हालांकि, इसका तोड़ भी बैंक ‘ब्याज अनुदान योजना’ के जरिए निकाल लेता है। नियमानुसार जब भी ग्राम सेवा सहकारी समितियों को इस ब्याज मुक्त योजना के तहत 2 प्रतिशत की ब्याज अनुदान राशि जारी की जाती है, तो वह अपेक्स बैंक स्तर से पैक्स और सीसीबी (केंद्रीय सहकारी बैंक) को अलग-अलग जारी नहीं होती। इसके बजाय यह राशि संयुक्त रूप से सीधे सीसीबी को ही जारी कर दी जाती है। ऐसे में सीसीबी पहले अपने स्तर पर इस ब्याज का समायोजन कर लेती है और फिर बची हुई शेष राशि ही पैक्स को देने के फरमान सुनाती है। इस व्यवस्था के कारण पैक्स को अपने मूल व्यवसाय पर मिलने वाले एकमात्र आय का स्रोत भी ओडी के नाम पर बैंक द्वारा समायोजित कर लिया जाता हैं, जिससे समितियों की वित्तीय स्थिति और बदतर हो रही है।



