सार
Rajasthan : वित्त विभाग की टालमटोल के कारण खरीफ ऋण चुकाने की अवधि नहीं बढ़ी है। इससे 5.58 लाख किसानों पर 196 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ब्याज भार पड़ेगा

विस्तार
जयपुर। डिजिटल डेस्क | 14 अप्रैल | राजस्थान के लाखों अन्नदाताओं पर अब कर्ज और ब्याज का भारी बोझ पड़ना तय नजर आ रहा है, और इसका सीधा जिम्मेदार वित्त विभाग का अड़ियल रवैया है। प्रदेश की डबल इंजन सरकार में किसानों को ब्याज मुक्त ऋण देने वाली लोक-कल्याणकारी योजना अब सरकारी फाइलों और विभाग की ‘ना-नुकुर’ के बीच दम तोड़ती दिख रही है। वही प्राकृतिक आपदाओं एवं तकनीकी कारणों से हर बार खरीफ ऋण चुकाने की अंतिम तिथि 31 मार्च से 30 जून तक बढ़ाने की परंपरा सालों से रही है, ताकि किसानों को राहत मिल सके। लेकिन इस बार वित्त विभाग ने सहकारिता विभाग की ओर से भेजी गई अंतिम तिथि बढ़ाने की फाइल को एक-दो बार नहीं, बल्कि चार बार अलग-अलग आपत्तियां लगाकर वापस लौटा दिया है। वित्त विभाग द्वारा अपेक्स बैंक और एसएलडीबी से ऐसी सूचनाएं मांगी जा रही हैं, जो महज प्रक्रिया को लंबा खींचने का बहाना प्रतीत होती हैं।
सहकारिता विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, खरीफ 2025 के करीब 5.58 लाख किसानों का 2184 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण ‘अवधिपार’ यानी ओवरड्यू हो गया है। समय सीमा नहीं बढ़ने के कारण अब इन किसानों को शून्य प्रतिशत के बजाय 9 प्रतिशत की भारी दर से ब्याज चुकाना होगा, जिसमें 7 प्रतिशत दंडनीय ब्याज और 2 प्रतिशत पेनल्टी शामिल है। विशेष रूप से बाड़मेर के 1.75 लाख और नागौर के 61 हजार किसान इस ब्याज की मार झेल रहे हैं। राज्य में नई सरकार के गठन के बाद से ही वित्त विभाग का सहकारिता विभाग के प्रति रुख संदेहास्पद रहा है, जहां कर्ज माफी, ब्याज अनुदान और क्षतिपूर्ति की राशि को लंबे समय से अटकाने के कारण सहकारी साख ढांचा चरमरा रहा है ।
इस पूरे गंभीर विषय पर जब ‘मारवाड़ का मित्र’ द्वारा वित्त विभाग के प्रमुख शासन सचिव वैभव गालरिया का पक्ष जानने के लिए उनके कार्यालय में बार-बार संपर्क किया गया, तो वहां से कोई जवाब नहीं मिला और फोन तक रिसीव करने की जहमत नहीं उठाई गई। वित्त विभाग की यह चुप्पी और टालमटोल की नीति प्रदेश के लाखों किसानों की जेब पर डाका डालने जैसी साबित हो रही है।
196 करोड़ रुपये का सीधा ब्याज
नियमों के मुताबिक, अब इन किसानों पर मूल धन के साथ-साथ 7 प्रतिशत दंडनीय ब्याज और 2 प्रतिशत पेनल्टी सहित कुल 9 प्रतिशत ब्याज का अतिरिक्त भार पड़ेगा। इस प्रकार, यदि 2184.01 करोड़ रुपये की इस बकाया राशि पर 9 प्रतिशत की दर से ब्याज वसूला जाता है, तो किसानों पर लगभग 196.56 करोड़ रुपये का सीधा ब्याज भार आएगा। यानी किसानों को अब कुल 2380.57 करोड़ रुपये चुकाने होंगे, जो सीधे तौर पर उनकी जेब पर डाका डालने जैसा है।

जनप्रतिनिधियों की ‘सामूहिक गुहार’ क्या बेअसर है?
इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों सरहदी जिले बाड़मेर से सत्ता और विपक्ष के नेताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सहकारिता मंत्री को पत्र लिखकर गुहार लगाई थी। बायतु विधायक हरीश चौधरी, बाड़मेर विधायक डॉ. प्रियंका चौधरी, चौहटन विधायक आदुराम मेघवाल के साथ-साथ भाजपा नेता स्वरूपसिंह खारा और बालाराम मूंढ ने एक सुर में तिथि बढ़ाने की मांग रखी थी। साथ ही, भारतीय किसान संघ ने भी इस विषय में मजबूती से गुहार लगाते हुए सरकार से शीघ्र निर्णय लेने का आग्रह किया था । जब सत्ता-विपक्ष के जनप्रतिनिधि और किसान संगठन एक ही मांग लेकर सरकार के पास पहुंचे हैं, तब भी अगर विभाग स्तर पर फाइलें अटकी रहती हैं, तो यह सीधे तौर पर किसानों की समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है।
“प्राकृतिक आपदाओं ओलावृष्टि एवं अतिवृष्टि सहित विभिन्न तकनीकी कारणों के चलते खरीफ ऋण चुकाने की अंतिम तिथि को 31 मार्च से बढ़ाकर 30 जून करने की तात्कालिक आवश्यकता है। वर्तमान में प्रदेश में ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश, पैक्स कार्मिकों में व्याप्त असंतोष और एफआईजी पोर्टल की तकनीकी विसंगतियों की स्थिति सर्वविदित है। संगठन द्वारा सहकारिता मंत्री, वित्त विभाग और शासन सचिव (सहकारिता) को पत्र लिखकर ऋणी किसानों एवं बैंक के व्यापक हित में ऋण अदायगी की तिथि बढ़ाने की माँग की गई है। यदि समय रहते यह निर्णय नहीं लिया गया, तो प्रदेश के 5.58 लाख किसानों पर लगभग 196 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ब्याज भार पड़ेगा। किसानों, पैक्स और सीसीबी को संभावित आर्थिक हानि से बचाने के लिए सरकार को अविलंब खरीफ ऋण वसूली की अवधि 30 जून तक बढ़ाने का निर्णय लेना चाहिए।”
— सूरजभान सिंह आमेरा, सहकार नेता


