सार
Jaipur : नेहरू सहकार भवन पर राजस्थान के हजारों पैक्स (PACS) कर्मचारियों ने लंबित मांगों को लेकर महापड़ाव डाला। इनकी मुख्य मांगें कैडर अथॉरिटी का गठन, नियमितीकरण और ऋण पर्यवेक्षकों के रिक्त पदों पर भर्ती हैं। सरकार के आश्वासन के बावजूद, संघर्ष समिति ने मांगें पूरी न होने पर अप्रैल में उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है।

विस्तार
जयपुर । डिजिटल डेस्क | 9 मार्च | प्रदेश की ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS-LAMPS) के हजारों कर्मचारियों ने आज अपनी लंबित मांगों को लेकर राजधानी जयपुर के नेहरू सहकार भवन के बाहर ऐतिहासिक महापड़ाव डाला। राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले आयोजित इस एक दिवसीय धरने में प्रदेश के कोने-कोने से आए कार्मिकों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और हुंकार भरी। सोमवार सुबह से ही जयपुर का नेहरू सहकार भवन परिसर ’हमारी मांगें पूरी करो’ और ’कैडर अथॉरिटी का गठन करो’ जैसे नारों से गूंज उठा। दरअसल, प्रदेश भर के विभिन्न जिलों से कर्मचारियों का जत्था जयपुर पहुंचना शुरू हो गया था। भीषण गर्मी और धूप के बावजूद, कर्मचारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। करीब 6 से 7 घंटों तक चले इस धरने में विभिन्न जिलों से आए जिला अध्यक्ष एवं पदाधिकारियों सहित पैक्स कर्मचारियों ने मंच से हुंकार भरी। वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार पिछले लंबे समय से सहकारिता के ढांचे को मजबूत करने वाले इन जमीनी कर्मचारियों की अनदेखी कर रही है। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि अब भी उनकी फाइलें दफ्तरों की धूल चाटती रहीं, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन उग्र रूप लेगा। धरने के बीच, संघर्ष समिति का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल सहकारिता मंत्री से मिलने सचिवालय पहुंचा। वार्ता के दौरान प्रतिनिधियों ने मंत्री के सामने अपनी प्रमुख मांगें रखीं और बताया कि किस तरह कैडर अथॉरिटी और नियमितीकरण की प्रक्रिया अटकी हुई है। मंत्री ने सकारात्मक आश्वासन तो दिया है, लेकिन कर्मचारी अब केवल मौखिक वादों से संतुष्ट होने के मूड में नहीं हैं। इस दौरान हनुमानसिंह राजावत (जालोर), कुलदीप जंगम (बांरा), मदन मैनारिया (उदयपुर), देवेन्द्र सैदावत (अलवर), नरपतसिंह चारण (सिरोही), बलदेवाराम गेट (नागौर), सत्यनारायण तिवाड़ी (भीलवाड़ा), श्रवणसिंह भाटी (बालोतरा) और महिपाल सिंह दवेला (बांसवाड़ा) शिवमंगलसिंह (पाली), तनेराजसिंह (बाड़मेर), वीरेन्द्रसिंह (जोधपुर) सहित हजारों की संख्या में कर्मचारी उपस्थित रहे। मंच का संचालन हेमंत कुमार व्यास (डूंगरपुर) द्वारा किया गया ।
प्रमुख मांगें जिन पर अड़ी है संघर्ष समिति
संघर्ष समिति ने प्रेस नोट जारी किया हैं । जिसके अनुसार, समितियों के कार्मिकों के लिए स्पष्ट कैडर अथॉरिटी और नियोक्ता तय करने की पत्रावलियां पिछले तीन महीनों से लंबित हैं, उन्हें तत्काल जारी किया जाए। तथा केंद्रीय सहकारी बैंकों में रिक्त ऋण पर्यवेक्षकों के पदों पर व्यवस्थापकों को आयु सीमा की बाध्यता हटाकर शत-प्रतिशत नियुक्ति दी जाए। इसके अलावा, बैंकिंग सहायक के पदों पर व्यवस्थापकों के लिए आरक्षित 20 प्रतिशत कोटे की चयन प्रक्रिया आज तक शुरू नहीं हुई है, जिसे अविलंब शुरू करने की मांग की गई है। साथ ही, 10 जुलाई 2017 से पूर्व नियुक्त कार्मिकों (व्यवस्थापक, सहायक व्यवस्थापक, सेल्समैन आदि) के नियमितीकरण की रुकी हुई प्रक्रिया को पुनः बहाल किया जाए।

आगामी रणनीति और अंतिम चेतावनी
संघर्ष समिति ने आज के धरने के माध्यम से सरकार को अंतिम चेतावनी दी है। प्रेस नोट में स्पष्ट किया गया है कि 27 फरवरी से जारी कार्य बहिष्कार के अगले चरण के रूप में, यदि मार्च माह तक समस्याओं का निराकरण नहीं हुआ, तो अप्रैल माह में जयपुर में एक विशाल रैली और महापड़ाव का आयोजन किया जाएगा। इसकी समस्त नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी शासन एवं प्रशासन की होगी।

विधायक गोपीचन्द मीणा ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
दिनभर चले हंगामे और नारेबाजी के बाद, प्रदर्शनकारियों का एक शिष्टमंडल सत्यनारायण तिवाड़ी के नेतृत्व में जहाजपुर विधायक और भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष गोपीचन्द मीणा से मिला । तिवाड़ी ने विधायक को अवगत कराया कि पैक्स कर्मचारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन आज वे स्वयं आर्थिक बदहाली की कगार पर हैं। शिष्टमंडल ने विधायक को बताया कि पूर्व में भी सरकार ने मांगों को मानने का ठोस आश्वासन दिया था, लेकिन आज दिनांक तक कोई प्रभावी आदेश या अधिसूचना जारी नहीं की गई है, जिससे कर्मचारियों में भारी आक्रोश व्याप्त है। मामले की गंभीरता को देखते हुए विधायक गोपीचन्द मीणा ने तत्काल संज्ञान लिया। उन्होंने मौके पर ही सहकारिता मंत्री से शिष्टमंडल की वार्ता करवाई। साथ ही विधायक मीणा ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को एक आधिकारिक पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है।

’कैडर’ फाइलों की भूलभुलैया में खोया एक और ’झुनझुना’?
- राजस्थान के सहकारिता महकमे में इन दिनों एक पुराना, घिसा-पिटा और बेहद ’लोकप्रिय’ खेल खेला जा रहा है ’फुटबॉल’। इस खेल के मैदान का नाम है सचिवालय, गेंद है ’कॉमन कैडर’ की फाइल, और खिलाड़ी हैं सहकारिता विभाग और वित्त विभाग। पिछले कई वर्षों से पैक्स कर्मचारी इसी मैदान पर पसीना बहा रहे हैं, उम्मीद में कि शायद इस बार गोल हो जाएगा। लेकिन हर बार की तरह, गोलपोस्ट बदल दिया जाता है और गेंद वापस उसी पुराने कोने में फेंक दी जाती है, जहाँ से वह चली थी। सहकारिता विभाग के गलियारों से खबर छनकर आई है कि कैडर अथॉरिटी के गठन के लिए बनी एक ’विशेष कमेटी’ ने अपनी मेहनत का फल यानी ड्राफ्ट वित्त विभाग की दहलीज पर रख दिया है। खबर यह भी है कि अब गेंद वित्त विभाग के पाले में है।
2018-19 का ’रीप्ले’: वही फिल्म, वही अंत
- इतिहास खुद को दोहराता है, और राजस्थान के सहकारिता विभाग में तो यह इतिहास ’लाइव’ टेलीकास्ट होता है। याद कीजिए 2018-19 का वह दौर। तब भी यही उत्साह था, तब भी सहकारिता विभाग ने कमेटी बनाई थी, तब भी यू.ओ. नोट जारी हुए थे और तब भी यही कहा गया था कि ’गेंद वित्त विभाग के पाले में है’। समय बीतता गया, सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन ’फाइल का सफर’ नहीं बदला। जब भी पैक्स कर्मचारियों ने पूछा, ‘‘साहब, हमारा कैडर कहाँ है?’’, जवाब मिला ‘‘फाइल वित्त विभाग में लंबित है।’’ लेकिन यहाँ एक बड़ा पेंच है। जब इसी फाइल के बारे में पूर्व समय में आरटीआई के जरिए वित्त विभाग से पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से हाथ खड़े कर दिए। उनका जवाब था ‘ऐसी कोई पत्रावली हमारे पास संधारित ही नहीं है।’ अब आम आदमी और पैक्स कर्मचारी किस पर भरोसा करें? क्या सहकारिता विभाग ने फाइल भेजी ही नहीं थी? या फिर वित्त विभाग के पास ’गायब करने वाली जादुई मशीन’ है? या शायद यह सरकारी फाइलों का ’बर्मूडा ट्रायंगल’ है, जहाँ फाइलें जाती तो हैं, पर कभी वापस नहीं आतीं?
1991ः जब ’आंदोलन’ ने दी थी थोड़ी सी रूह
इतिहास गवाह है कि जब तक सड़क पर पसीना न बहे, फाइलों पर स्याही नहीं सूखती। 1991 में पैक्स व्यवस्थापकों ने करीब 10 महीने तक लंबी लड़ाई लड़ी थी। तब जाकर कहीं ’वेतन’ का बीज अंकुरित हुआ था। बदले में क्या मिला? सिर्फ 50 रुपये की वेतन वृद्धि! क्या 35 साल बाद भी व्यवस्था वही है? आज का पैक्स कर्मचारी 2026 में खड़ा होकर वही मांग कर रहा है जो उसके पूर्वज 1990 में कर रहे थे। वक्त बदला, तकनीक बदली, ’डिजिटल इंडिया’ आया, लेकिन पैक्स कर्मचारियों का ’संघर्ष’ आज भी उसी ’मैन्युअल’ दौर में फंसा है।
एक्सपर्ट व्यू
आज फिर वही दावा किया जा रहा है कि ड्राफ्ट तैयार है। पैक्स कर्मचारियों को फिर से वही उम्मीद जगाई जा रही है। लेकिन इस बार का ’कैडर का झुनझुना’ पहले से अधिक खोखला है। सहकारिता विभाग को अब यह समझना होगा कि कर्मचारी अब ’सूचना के अधिकार’ के युग में जी रहे हैं। उन्हें पता है कि फाइल कहाँ रुकी है और कौन उसे रोक रहा है। अगर इस बार भी यह ’झुनझुना’ महज दिखावा साबित हुआ, तो यह केवल कर्मचारियों के विश्वास का अपमान नहीं होगा, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गहरा सवालिया निशान होगा। वित्त विभाग को भी अब ’अज्ञात’ पत्रावलियों का बहाना छोड़कर पारदर्शी होना होगा। क्या कैडर का ड्राफ्ट सच में वहां है? अगर है, तो उस पर निर्णय क्यों नहीं हो रहा? अगर नहीं है, तो सहकारिता विभाग झूठ क्यों बोल रहा है?


