सार
FIG पोर्टल ने पैक्स के अधिकारों को सीमित कर दिया है। कर्मचारियों के कार्य बहिष्कार से वसूली ठप है और किसान बैंकों के चक्कर काट रहे हैं।

विस्तार
जयपुर । डिजिटल डेस्क । 28 मार्च । राजस्थान के सहकारिता विभाग की ब्याज मुक्त योजना में इन दिनों ऐसा कोहराम मचा है कि आम किसान और पैक्स कर्मचारी, दोनों ही सिस्टम अपडेट होने का इंतज़ार करते-करते खुद आउटडेटेड महसूस कर रहे हैं। मामला है एफआईजी पोर्टल का है। यह पोर्टल एक ऐसा अभेद्य किला, जिसे जयपुर के एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर इसलिए बनाया गया था ताकि पैक्स ऋण व्यवसाय में पारदर्शिता आए, लेकिन धरातल पर इसने वह पारदर्शिता दिखाई है कि पैक्स की आय के स्रोत ही बंद हो गए हैं। साल 2019 में जब ऑनलाइन ऋण वितरण एवं पंजीयन पॉलिसी का जन्म हुआ, तो ढोल-नगाड़े बजाकर बताया गया कि एफआईजी पोर्टल ही अब पैक्स के ऋण व्यवसाय का मसीहा होगा। कहा गया कि पैक्स ही नोडल एजेंसी होगी। लेकिन हकीकत में, इस पोर्टल ने पैक्स-लैम्प्स के अधिकारों की ऐसी सर्जरी की कि अब पैक्स केवल नाम की संस्थाएं रह गई हैं। मजेदार बात यह है कि जिस तकनीक को भ्रष्टाचार रोकने के लिए लाया गया था, उसने पैक्स पर ब्याज पर ब्याज का ऐसा बोझ लाद दिया कि पैक्स के कर्मचारी अब गणितज्ञ बनने की राह पर हैं। ऋण समय पर चुकाने पर 4 प्रतिशत ब्याज अनुदान का जो लालच पैक्स को दिया गया था, वह अनुदान पोर्टल की गलियों में कहीं खो गया है।

सीसीबी की चौखट पर मेला, पैक्स पर ताला
31 मार्च नजदीक है। यह तिथि अल्पकालीन फसली ऋण का चुकारा करने की अंतिम तिथि हैं । इस तिथि तक किसान अगर सीजनली ऋण का चुकारा नहीं करता हैं, तो किसान की ऋण राशि को अवधिपार श्रेणी में वगीकृत कर, उससे मूल राशि सहित 9 प्रतिशत ब्याज वसूला जाएगा । ऐसे में किसान पैसा लेकर पैक्स जा रहा है, लेकिन वहां कार्य बहिष्कार का बोर्ड उनका स्वागत कर रहा है। नतीजा? जोधपुर से जालोर केंद्रीय सहकारी बैंक की शाखाओं पर वैसी ही भीड़ है, जैसी कभी नोटबंदी के वक्त हुआ करती थी।
विभागीय विशेषज्ञों की मानें तो पोर्टल ने पैक्स के आय के स्रोत (ब्याज अनुदान) को ऐसे निचोड़ा है जैसे नींबू। नई पैक्स में करोड़ों के ऋण वितरण पर रोक लगाकर उन्हें वित्तीय रूप से कोमा में भेज दिया गया है। जब कमाई ही नहीं होगी, तो कर्मचारियों को वेतन कहां से मिलेगा? पिछले कई महीनों से वेतन की बाट जोह रहे कर्मचारी अब कैडर और वेतन की मांग को लेकर कार्य बहिष्कार पर हैं।
नेतृत्व का हुंकार यह तो झांकी है, आंदोलन बाकी है
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हनुमानसिंह राजावत, देवेन्द्र कुमार सैदावत का तेवर तल्ख है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यह लड़ाई अब आर-पार की है। एफआईजी पोर्टल हमारे लिए फांसी का फंदा बन गया है। सरकार ने हमें डिजिटल बनाने के चक्कर में कंगाल बना दिया। न कैडर का ठिकाना है, न वेतन का। जब तक कैडर की मांग पर लिखित मुहर नहीं लगती, तब तक पैक्स में ऋण वितरण एवं वसूली कार्य प्रारम्भ नहीं होगा । यह आंदोलन लंबा चलेगा, चाहे 31 मार्च आए या जाए।
विभाग की सरकारी सफाई: प्रक्रिया जारी है…
जब इस अराजकता पर विभाग के विशेषज्ञों से पूछा गया, तो उन्होने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कैडर गठन एक जटिल प्रक्रिया है। उन्होने कहा कि नियमों में संशोधन के लिए फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर दौड़ रही हैं। सरकार से वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति अनिवार्य है, जिस पर गहन विचार-विमर्श चल रहा है। हालांकि विशेषज्ञ यह बताना भूल गए कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक पोर्टल की बलि चढ़कर कितनी पैक्स दम तोड़ चुकी होंगी।
पोर्टल की जीत, पैक्स की हार?
आज स्थिति यह है कि किसान सीसीबी की शाखाओं के बाहर लाइन में है, कर्मचारी मैदान में है और अधिकारी फाइल में है। एफआईजी पोर्टल एक ऐसा सफल गेटवे साबित हुआ है जिसने सफलतापूर्वक पैक्स को पंगु बना दिया है। यदि समय रहते कैडर की मांग और पोर्टल की विसंगतियों को ठीक नहीं किया गया, तो 31 मार्च या 31 दिसंबर का लक्ष्य केवल कागजों में पूरा होगा ।


