सार
माननीय चिकित्सा मंत्री गजेंद्रसिंह खींवसर व अन्य विधायकों की लिखित शिकायत पर हुई थी कार्रवाई।जांच अधिकारी द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद परिणाम और दिशा-निर्देश जारी न होने से अतिरिक्त रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका पर उठ रहे गंभीर सवाल।मारवाड़ प्रांत के सहकार महकमे में स्थानीय अधिकारियों का पदस्थापना और कथित राजनीतिक सह पर टिकी लोगों की निगाहें।
विस्तार 
जोधपुर: |सहकारी जगत की ग्राउंड रिपोर्ट 10 सितंबर|प्रदेश के सहकारी महकमे में सुशासन, पारदर्शिता और एसओपी आधारित कार्यप्रणाली के दावों की धज्जियाँ जोधपुर स्थित अतिरिक्त रजिस्ट्रार (सहकारी समितियाँ) कार्यालय की कार्यशैली उड़ा रही हैं। इस महत्त्वपूर्ण पद पर अमूमन स्थानीय स्तर के सहकार सेवा के अधिकारियों के ही काबिज रहने का पुराना इतिहास रहा है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यहाँ की सुस्त और लचर कार्यसंस्कृति ने सहकार जगत में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सत्तारूढ़ दल के कद्दावर कैबिनेट मंत्री और स्थानीय विधायकों की लिखित शिकायत से जुड़ा है, जिस पर नियमानुसार जांच अधिकारी द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद आज दिन तक जांच परिणाम और दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं।
प्राप्त विभागीय जानकारी के अनुसार, यह पूरा प्रकरण चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्रसिंह खींवसर एवं अन्य विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित शिकायती पत्र से उपजा है। तकनीकी सहायक, रजिस्ट्रार (सहकारी समितियाँ) जयपुर के पत्र और अतिरिक्त रजिस्ट्रार (द्वितीय) प्रधान कार्यालय जयपुर द्वारा तथ्यात्मक रिपोर्ट के परीक्षणोपरांत, राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम 2001 की धारा 55 के तहत जांच के आदेश जारी किए गए थे।यह मामला जोधपुर संभाग के विभिन्न जिलों—जोधपुर, पाली, जालोर, सिरोही, बाड़मेर एवं जैसलमेर के केंद्रीय सहकारी बैंकों में कार्यरत कार्मिकों की डीपीसी (पदोन्नति) और सहकारी संस्थाओं की वित्तीय सेहत में बरती गई कथित अनियमितताओं से जुड़ा है।
प्रकरण में तत्कालीन अतिरिक्त रजिस्ट्रार शुद्धोद्धन उज्ज्वल के कार्यकाल के दौरान हुए कार्य-निष्पादन की जांच का जिम्मा रामसुख, सचिव (प्राथमिक सहकारी भूमि विकास बैंक लि. बिलाड़ा, जिला जोधपुर) को जांच अधिकारी के रूप में सौंपा गया था। जांच अधिकारी द्वारा तय समय सीमा में अपनी जांच पूर्ण कर रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जा चुकी है, इसके बावजूद जोधपुर कार्यालय स्तर पर परिणाम को रोककर रखा जाना कई आशंकाओं को जन्म देता है।
डिजिटल ऐप, एसओपी और पारदर्शी दावों की खुली पोल
एक तरफ सहकारिता विभाग डिजिटल प्लेटफॉर्म, पारदर्शी प्रक्रियाओं और फाइलों के त्वरित निस्तारण के लिए एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर मारवाड़ प्रांत के इस प्रमुख सहकार कार्यालय में कैबिनेट मंत्री स्तर की शिकायत पर हुई जांच का परिणाम दबा होना व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। बैंकिंग सेक्टर जैसी संवेदनशील व्यवस्था में पदोन्नतियों और सहकारी संस्थाओं की वित्तीय सेहत से जुड़े मामलों में इस तरह की हीला-हवाली सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि स्थानीय स्तर के अधिकारियों पर राजनीतिक संरक्षण कितना हावी है।मारवाड़ के सहकार जगत में यह चर्चा आम हो गई है कि जब सत्ताधारी दल के खुद कैबिनेट मंत्री की शिकायत पर हुई गंभीर जांच और रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद भी फाइलें ठंडे बस्ते में पड़ी रहती हैं, तो आम सहकार कर्मियों और नागरिकों का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है। जोधपुर कार्यालय में पदस्थ अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका अब खुली चर्चा का विषय बन चुकी है। अब देखना यह होगा कि सहकारिता विभाग का उच्च प्रबंधन इस मामले का संज्ञान लेकर क्या कार्रवाई करता है या फिर राजनीतिक सह के चलते यह प्रकरण यूं ही फाइलों में दफन होकर रह जाता है?


