Home राज्य शीतलहर व पाले के नुकसान से फसलों को सुरक्षित रखने के उपाय

शीतलहर व पाले के नुकसान से फसलों को सुरक्षित रखने के उपाय

Measures to protect the crops from the damage of cold wave and frost

जालोर 6 जनवरी। कृषि विभाग द्वारा शीत लहर के कारण पाला पड़ने की संभावनाओं को देखते हुए फसलों को सुरक्षित रखने के उपाय बताए गए हैं। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. आर.बी.सिंह ने बताया कि वर्तमान में जालोर जिले में रात का तापमान अत्यधिक कम हो जाने एवं हवा नहीं चलने के कारण पाला (शीतलहर) पड़ने की पूर्ण संभावना है। पाला पड़ने से लगभग सभी फसलों में नुकसान होता है। पौधों की पत्तियां व फूल झुलस कर झड़ जाते है तथा अधपके फल सिकुड़ जाते है। फलियों व बालियों में दानें नहीं बनते है व बन रहे दाने सिकुड़ जाते है। जिससे फसलों एवं फलदार वृक्षों में उपज में भारी नुकसान होता है। उन्होंने शीतलहर एवं पाले से फसल की सुरक्षा के उपायों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि पौधशालाओं के पौधों एवं सीमित क्षेत्र वाले उद्यानों व सब्जी वाली फसलों में भूमि के ताप को कम न होने देने के लिए फसलों को टाट, पोलिथिन अथवा भूसे से ढ़क देवें। वायुरोधी टाटियां, हवा आने वाली दिशा की तरफ यानि उत्तर-पश्चिम की तरफ बांधे। नर्सरी, किचनगार्डन एवं कीमती फसल वाले खेतों में उत्तर-पश्चिम की तरफ टाटियां बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगायें तथा दिन में पुनः हटायें। जब पाला पडने की सम्भावना हो, तब फसलों में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। नमीयुक्त जमीन में काफी देरी तक गर्मी रहती है तथा भूमि का तापक्रम एकदम कम नहीं होता है जिससे तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं गिरेगा और फसलों को पाले से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। जिन दिनों पाला पड़ने की संभावना हो, उन दिनों फसलों पर घुलनशील गन्धक एग्रीकल्चर ग्रेड 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) में घोल बनाकर छिडकाव करें। ध्यान रखें कि पौधों पर घोल की फुहार अच्छी तरह लगे। छिड़काव का असर दो सप्ताह तक रहता है। यदि इस अवधि के बाद भी शीत लहर व पाले की संभावना बनी रहे तो छिड़काव को 15-15 दिन के अन्तर से दोहराते रहे या थायो यूरिया 500 पी.पी.एम. (आधा ग्राम) प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिडकाव करें। सरसों, गेहूँ, चना, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने में गन्धक का छिडकाव करने से न केवल पाले से बचाव होता है, बल्कि पौधों में लौहा तत्व की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता बढ जाती है जो पौधों में रोग रोधिता बढाने में एवं फसल को जल्दी पकाने में सहायक होती है। दीर्घकालीन उपाय के रूप में फसलों को बचाने के लिये खेत की उत्तरी पश्चिमी मेंडो पर तथा बीच-बीच में उचित स्थानां पर वायु अवरोधक पेड़ जैसे- शहतूत, शीशम, बबूल, खेजडी, अरडू आदि लगा दिये जाये तो पाले और ठंडी हवा के झौंकां से फसल का बचाव हो सकता है। अधिक जानकारी के लिए किसान सेवा केन्द्र या कृषि कार्यालय में सम्पर्क करें।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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