Home स्‍पेशल पैक्स कंप्यूटराइजेशन योजना में 2630 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का मिलान लंबित

पैक्स कंप्यूटराइजेशन योजना में 2630 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का मिलान लंबित

सार 

प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के डिजिटलीकरण में डेटा मिलान और प्रमाणीकरण में देरी एक बड़ी बाधा है। नाबार्ड ने राज्यों को समयबद्ध तरीके से लंबित खातों का समाधान करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

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विस्तार 

नई दिल्ली । डिजिटल डेस्क | 14 मार्च | प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (Pacs) के डिजिटलीकरण और उन्हें ’ई-पैक्स’ के रूप में घोषित करने की प्रक्रिया में कई बाधाओं सामने आ रही है। अब नाबार्ड और सहकारिता मंत्रालय ने राज्यों से लंबित पड़ी अनमेल शेष राशियों के तत्काल समाधान के लिए त्वरित कार्रवाई करने को कहा है। दरअसल, पैक्स के डेटा को ERP (एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग) सिस्टम में माइग्रेट किया गया है। लेकिन, इस डेटा की प्रमाणिकता और पूर्णता सुनिश्चित करने के लिए सभी खातों का मिलान और प्रमाणीकरण अनिवार्य है। नाबार्ड के अनुसार, अभी भी देशभर में लगभग 2630.22 करोड़ रुपये की राशि का मिलान या प्रमाणीकरण होना बाकी है। यह देरी सरकार के ’ई-पैक्स ऑनली’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में एक बड़ी बाधा बनी हुई है। नाबार्ड ने राज्यों के अनुसार समस्याओं को वर्गीकृत कर समाधान के निर्देश दिए हैं । इनमें गुजरात, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में प्रमाणीकरण प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुके हैं, लेकिन ऑडिटर्स ईआरपी में राशि को अधिकृत करने में अनिच्छुक हैं। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे ऑडिटर्स को एक सप्ताह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दें। साथ ही, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में मिलान पूरा हो चुका है, लेकिन प्रमाणीकरण अभी भी राज्य स्तर पर लंबित है। इन्हें एक सप्ताह के भीतर इसे पूरा करने के लिए सख्त निर्देश जारी करने को कहा गया है। इसके अलावा, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी, मेघालय, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और अंडमान-निकोबार में मिलान प्रक्रिया अभी चल रही है। इन्हें 15 दिन का समय दिया गया है। यदि इसके बाद भी काम पूरा नहीं होता, तो इसे राष्ट्रीय स्तर की समिति की बैठक का एजेंडा बनाया जाएगा। जबकि पश्चिम बंगाल, मेघालय और नागालैंड के डेटा में त्रुटियों के कारण ’रोलबैक’ की स्थिति है। इन राज्यों को डेटा एंट्री दोबारा शुरू करते समय आवश्यक सुधार करने होंगे।

प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश

सहकारिता मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रजिस्ट्रार,सहकारी समितियां को निर्देश दिए हैं कि वे इस प्रक्रिया में तेजी लाएं। नाबार्ड ने भी स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर यह काम पूरा नहीं होता है, तो मामले को उच्च-स्तरीय समिति एनएलएमआईसी की बैठक में समीक्षा के लिए रखा जाएगा ताकि इस महत्वपूर्ण सुधार कार्य को समय पर पूरा किया जा सके।

रिकॉन्सिलिएशन के भंवर में फंसा डिजिटल का दावा

डिजिटल पैक्स और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावों के बीच, प्राथमिक कृषि साख समितियों का डिजिटलीकरण अब ’डेडलाइन’ और ’रिकॉन्सिलिएशन’ (मिलान) के भंवर में फंसा नजर आ रहा है। नाबार्ड की हालिया चिट्ठियों से जो तस्वीर उभर रही है, वह सरकारी काम-काज की कछुआ चाल और सुस्ती की एक और मिसाल है। पैक्स के डिजिटल भविष्य की इमारत खड़ी करने का दावा तो जोर-शोर से किया जा रहा है, लेकिन नींव में अभी भी अरबों रुपयों का बेमेल डेटा दबा हुआ है। देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह सरकारी ’एडवाइजरी’ किसी काम आएगी, या ’ई-पैक्स’ का सपना सिर्फ फाइलों की धूल में ही दबकर रह जाएगा?

’पधारो म्हारे देस’ में ’हिसाब’ लापता!

राजस्थान का सहकारिता विभाग ’कछुआ चाल’ को भी मात दे रहा है। ताज़ा मामला पैक्स के कंप्यूटरीकरण और उनके वित्तीय मिलान से जुड़ा है, जहां राजस्थान के कई जिलों की समितियों ने करोड़ों रुपयों का हिसाब ’हवा’ में छोड़ रखा है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत पैक्स का कंप्यूटरीकरण होना था ताकि पारदर्शिता आए। लेकिन राजस्थान की 35 बड़ी समितियों की जो सूची सामने आई है, उसे देखकर लगता है कि यहां ’पारदर्शिता’ नहीं, बल्कि ’पहेली’ चल रही है। अजमेर से लेकर जैसलमेर के धोरों तक, और बांसवाड़ा के जंगलों से लेकर जालौर की धरती तक करोड़ों रुपये अनरेकन्साइल्ड हैं।

जिलों का हालः जहां आंकड़ों की ’रेत’ उड़ रही है

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान के कुछ प्रमुख जिलों की स्थिति इस प्रकार है जो विभाग की कार्यक्षमता पर कड़ा सवाल कसती है । बांसवाड़ा और डूंगरपुर आदिवासी अंचल के विकास के नाम पर ढिंढोरा पीटने वाले विभाग को यह नहीं पता कि छाजा, गमाना और कनेला जैसी समितियों में लाखों-करोड़ों की विसंगति क्यों है? अकेले कनेला समिति में 98,40,779 का हिसाब नहीं मिल रहा। इसी तरह सीमावर्ती जिले जैसलमेर की खुइयाला समिति ने तो रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यहां 1,85,48,534 से ज्यादा की राशि अन-रिकॉन्सिल्ड है। शायद रेगिस्तान की आंधी में विभाग के कैलकुलेटर की बैटरी खत्म हो गई थी! इतना ही नहीं, अजमेर और जालौर में भी हिसाब ’पत्थर’ जैसा सख्त हो गया है। दंतरा और बदनवाड़ी जैसी समितियों में भी 50 लाख से 70 लाख रुपये के बीच का हिसाब ’लापता’ है।

मंत्रालय की फटकार, फिर भी ’साहब’ बेखबर

भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय द्वारा जारी पत्र स्पष्ट रूप से दिशा-निर्देश देता है कि Go-Live से पहले डेटा का मिलान अनिवार्य है। पत्र में साफ लिखा है कि जब तक पुरानी विसंगतियां दूर नहीं होतीं और राज्य सरकार इसकी पुष्टि नहीं करती, तब तक आगे की प्रक्रिया बाधित रहेगी। लेकिन राजस्थान के सहकारिता गलियारों में शायद यह पत्र किसी फाइल के नीचे दबकर ’विश्राम’ कर रहा है।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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