सार
Special Report : राजस्थान राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण की सुस्ती के कारण जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और शीर्ष संस्थाओं में निर्वाचित बोर्ड का अभाव है।

विस्तार
जयपुर । डिजिटल डेस्क | 25 मार्च | राजस्थान के सहकारिता विभाग द्वारा हाल ही में जारी ’प्रगति प्रतिवेदन’ विभाग की उपलब्धियों का बखान तो करता है, लेकिन चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण एक अलग ही तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि विभाग अपनी कागजी सफलताओं पर स्वयं ही मुग्ध है, जबकि धरातल पर सहकारिता का ढांचा ’लोकतंत्र’ के बजाय ’अधिकारी तंत्र’ और ’प्रशासनिक मनमर्जी’ की भेंट चढ़ चुका है। प्रदेश की सहकारी संस्थाओं में चुनावों की स्थिति वैसी ही है, जैसे रेगिस्तान में बारिश की उम्मीदकृचर्चा तो बहुत है, परंतु परिणाम दुर्लभ हैं। राजस्थान राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण संभवतः प्रदेश का सबसे ’निष्क्रिय’ प्राधिकरण बन चुका है। शीर्ष सहकारी संस्थाओं के गठन से लेकर अब तक, कई महत्वपूर्ण पदों ने लोकतांत्रिक चुनाव की प्रक्रिया तक नहीं देखी है। अक्सर देखा जाता है कि निर्वाचन प्राधिकरण ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स) के चुनाव करवाकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री कर लेता है। इन्हीं समितियों के पदाधिकारी आगे चलकर जिला सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार, क्रय-विक्रय सहकारी समितियों और केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) के प्रतिनिधि चुने जाते हैं।
विडंबना यह है कि जब सीसीबी से लेकर शीर्ष स्तरीय सहकारी संस्थाओं के चुनाव की बारी आती है, तब तक कार्यकाल की समाप्ति का समय आ जाता है और प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली जाती है। प्रदेश के केंद्रीय सहकारी बैंकों में लोकतांत्रिक प्रणाली को किसी पुराने संदूक में बंद कर चाबी सहकारिता विभाग में जमा करा दी गई है। नियम कहते हैं कि, इन संस्थाओं में एक ’निर्वाचित संचालक मंडल’ और ’चेयरमैन’ का होना अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान में यह व्यवस्था पूरी तरह प्रशासनिक अधिकारियों के कंधों पर ‘प्रशासक’ पदभार के तौर पर टिकी है।
जिला कलेक्टर, जिनके पास जिले की कानून-व्यवस्था और विकास से जुड़े अनगिनत महत्वपूर्ण दायित्व पहले से ही हैं, उन्हें अब इन सहकारी बैंकों के संचालन की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ रही है। एक प्रशासनिक अधिकारी, जिसकी प्राथमिकता जनसुनवाई और जिले के व्यापक प्रशासनिक कार्य होते हैं, उनके लिए बैंक की ऋण योजनाओं और दैनिक बैंकिंग फाइलों के सूक्ष्म प्रबंधन के लिए समय निकालना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव में जिले के सबसे व्यस्तम प्रशासनिक अधिकारी के जरिए इन सीसीबी बैकों को चलाना सहकारिता के मूल लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप है?
सुस्त चुनावी प्रक्रिया का दंश: कार्यकाल खत्म होने को है, पर चुनाव का नामोनिशान नहीं…
जब जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) में निर्वाचित बोर्ड अस्तित्व में नहीं होता, तब ’सैंया भए कोतवाल, अब डर काहे का’ वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा नियमों को ताक पर रखकर अपात्र व्यक्तियों को बिना किसी ठोस अनुशंसा के प्रबंध निदेशक (MD) के पदों पर बिठाया जा रहा है। कहीं स्थानीय राजनीति का दबाव हावी है, तो कहीं जयपुर सचिवालय में बैठे ’आकाओं’ का वरदहस्त। आलम यह है कि बैंकिंग के ’ब’ से भी अनजान लोगों को बैंक की कमान सिर्फ इसलिए सौंप दी गई है क्योंकि वे ’जी हुज़ूर’ कहने में माहिर हैं। इन लोकतांत्रिक संस्थाओं में अब निर्वाचित बोर्ड के बजाय ’मैनेजमेंट कोटे’ के लोग मनमानी कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के अभाव में ये सहकारी बैंक अब किसान और ग्राहक कल्याण के केंद्र न रहकर, राजनीतिक सौदेबाजी के अड्डे बनकर रह गए हैं। विडंबना यह है कि यह खेल पहली बार नहीं हो रहा; 2014 में भी सत्ता के गलियारों से यही पटकथा लिखी गई थी। राज्य की अधिकांश सीसीबी में संचालक बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद चुनाव नहीं कराए जा रहे हैं। साल 2022 में ग्राम सेवा सहकारी समितियों (Pacs) के चुनाव हुए थे, लेकिन प्रक्रिया इतनी सुस्त रही कि अब उनके कार्यकाल का महज एक साल शेष है। ऐसे में जब तक जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों के चुनाव की बारी आएगी, तब तक इन समितियों में फिर से ’प्रशासक राज’ दस्तक दे चुका होगा। डर यही है कि इस चक्रव्यूह के कारण सीसीबी बैंकों के चुनाव फिर से एक दशक के लिए ठंडे बस्ते में न चले जाएं।
फैक्ट फाइल
| सहकारी संस्था का वर्ग | कुल निर्वाचन योग्य संस्थाएं | संपन्न चुनाव | चुनाव जो अभी भी ‘शेष’ हैं |
| शीर्ष सहकारी संस्था | 17 | 03 | 14 |
| केंद्रीय सहकारी बैंक | 29 | 00 | 29 |
| जिला सहकारी संघ | 24 | 02 | 22 |
| प्राथमिक दुग्ध समितियां | 8711 | 7054 | 1657 |
| पैक्स/लैम्प्स/जी.एस.एस. | 8618 | 6634 | 1984 |
| कुल योग (सभी श्रेणियां) | 19427 | 14926 | 4501 |
निचले स्तर पर चुनाव, शीर्ष पर सन्नाटा: प्राधिकरण की चयनात्मक सक्रियता
राजस्थान राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण, जो एक स्वायत्त संस्था होने का दावा करता है, वर्तमान में अपनी निष्क्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश की कुल 30,139 पंजीकृत संस्थाओं में से मात्र 14,926 में ही चुनाव संपन्न हो पाए हैं। शेष आधे से अधिक संस्थाएं या तो नियति के भरोसे हैं या ’प्रशासकों’ के नियंत्रण में। विडंबना यह है कि विभाग अपनी विफलता छिपाने के लिए ग्राम सेवा सहकारी समितियों (पैक्स-लैम्पस) के चुनावों को ढाल बना रहा है। छोटे स्तर पर किसानों के मतदान करवाकर लोकतंत्र का भ्रम पैदा किया जा रहा है, जबकि रसूख वाली ’शीर्ष संस्थाओं’ के चुनावों पर जैसे अघोषित रोक लगा दी गई है।
“प्रदेश की सहकारी संस्थाओं में लंबे समय से चुनाव नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है। प्रदेश में पिछले 12 वर्षों से सीसीबी से लेकर अपेक्स तक की संस्थाओं में चुनाव लंबित हैं, जिससे बैंकिंग और प्रबंधकीय ढांचा कमजोर हुआ है। हमारी मांग है कि निर्वाचन प्राधिकरण अपनी निष्क्रियता त्यागकर सभी शीर्ष संस्थाओं और केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) में अविलंब लोकतांत्रिक चुनाव संपन्न कराए, ताकि सहकारी संस्थाओं एवं उनके सदस्यों का हित सुरक्षित रहते हुए सहकारिता का मूल स्वरूप बहाल हो सके। —सूरजभानसिंह आमेरा, कद्दावर सहकार नेता ।


