सारांश
जालोर में 10 वर्षों में 93 नई पैक्स (PACS) बनने के बावजूद ऋण लक्ष्य 10 साल पुराना ही अटका है। नियम विरुद्ध नियुक्तियों और अधिकारियों की अनदेखी से समितियां संचित हानि में डूबी हैं तथा बैंक का 110 करोड़ रुपए कर्ज अवधिपार (Overdue / NPA) हो गया है।
विस्तार 
जालोर। |सहकारी जगत ग्राउंड रिपोर्ट, 12 अक्टूबर!|जालोर जिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों ( Primary Agricultural Credit Societies) का दायरा कागजों में तो तेजी से बढ़ा है, लेकिन किसानों को मिलने वाले अल्पकालीन फसली ऋण (Short-term Crop Loan) की स्थिति बदहाल होती जा रही है। सहकारिता विभाग के दावों के विपरीत धरातल पर ऋणी किसानों को मिलने वाली साख (Credit Limit) सीमा लगातार घट रही है।आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2016-17 में पैक्स से जुड़े ऋणी सदस्यों को खरीफ और रबी सीजन में एकमुश्त 1.50 लाख रुपए तक का ऋण मिलता था। वहीं आज स्थिति यह है कि जिले के करीब 1.40 लाख ऋणी सदस्यों में से किसी को भी यह राशि एकमुश्त नहीं मिल पाई है। नए सदस्यों को तो महज 8 हजार रुपए के ऋण वितरण पर ही संतोष करना पड़ रहा है।दूसरी ओर, जिले में पैक्स की संख्या एक दशक में 161 से बढ़कर 254 तक पहुंच गई, लेकिन केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB – Central Cooperative Bank) का वार्षिक ऋण वितरण लक्ष्य 10 साल पुराने स्तर पर ही अटका हुआ है। वर्ष 2017-18 में जहां 700 करोड़ रुपए का वार्षिक लक्ष्य निर्धारित था, वहीं इस वित्तीय वर्ष में भी यह केवल 747 करोड़ रुपए ही रखा गया है। इसके अलावा, वर्ष 2018 में 161 पैक्स में से 145 में मिनी बैंक (Mini Banks) संचालित थे, लेकिन सितंबर 2026 तक समितियों की संख्या 254 होने के बावजूद मिनी बैंकों की संख्या 145 पर ही सीमित है।उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 की राजस्थान सहकारी फसली ऋण माफी योजना के तहत जिले में 161 पैक्स के 81,420 ऋणी सदस्यों का 228.25 करोड़ रुपए का ऋण माफ किया गया था। इसके बाद वर्ष 2019 में राजस्थान कृषक ऋण माफी योजना के तहत 78,567 किसानों का 287.74 करोड़ रुपए का कर्ज माफ हुआ था। इसके बावजूद जिले की ऋण वितरण व्यवस्था में सुधार नहीं हो सका।
नियमों को दरकिनार कर बना दीं नई समितियां, जिम्मेदारी से झाड़ा पल्ला
जालोर जिले में बीते दस वर्षों में सहकारिता विभाग के अधिकारियों और निरीक्षकों ने राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम (Rajasthan Cooperative Societies Act) के प्रावधानों को दरकिनार करते हुए करीब 93 नवीन ग्राम सेवा सहकारी समितियों (PACS) का गठन तो कर दिया, लेकिन अब इनकी कार्यप्रणाली रामभरोसे छोड़ दी गई है।अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर आनन-फानन में नई समितियों का पंजीयन (Registration) कर पुराने पैक्स व्यवस्थापकों (Managers) को ही इनका रजिस्ट्रेशन थमा दिया। परंतु जब इन नई समितियों में ऋण वितरण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां (Commercial Activities) शुरू करने की बात आई, तो सहकारिता विभाग के कारिंदों ने चुप्पी साध ली। विभाग के अधिकारियों ने सारा दारोमदार जालोर केंद्रीय सहकारी बैंक (CCB) पर डाल दिया, जो स्वयं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI ) से लाइसेंस प्राप्त एक वाणिज्यिक संस्थान है।बिना पर्याप्त वित्तीय साधनों (Financial Resources) और स्पष्ट कार्ययोजना (Action Plan) के नई समितियों के गठन से सहकारी आंदोलन का मूल उद्देश्य ही भटक गया है। अधिकारियों की इस लापरवाही का सीधा असर जिले के उन हजारों किसानों पर पड़ रहा है, जो नई समितियों से जुड़ने के बावजूद फसली ऋण और अन्य सहकारी सुविधाओं के लिए बैंक के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
नियम विरुद्ध नियुक्ति से पैक्स को लगा वित्तीय चूना, संचित हानि में डूब गईं मजबूत समितियां

जिले की ग्राम सेवा सहकारी समितियों में राजस्थान सहकारी सोसायटी अधिनियम व उपविधियों (Bylaws) को ताक पर रखकर व्यवस्थापकों की नियुक्तियों का ऐसा खेल चल रहा है, जिसने आर्थिक रूप से मजबूत समितियों को भी बदहाली के कगार पर ला खड़ा किया है। समितियों की संचित पूंजी (Accumulated Capital) को हर साल लाभ के रूप में बढ़ाने के बजाय, कुछ व्यवस्थापकों ने इसके आरक्षित कोष (Reserve Fund) को ही पूरी तरह समाप्त कर दिया। सेवा हस्तांतरण (Service Transfer) और पूर्णकालिक पद का झांसा देकर जिले की अधिकांश वित्तीय रूप से सक्षम पैक्स को संचित हानि (Accumulated Loss) के गर्त में धकेल दिया गया है।हालत यह है कि जिला मुख्यालय के समीप स्थित जिले की एक नामचीन मिनी सहकारी बैंक (पैक्स) में व्यवस्थापक पद पर काबिज होने का नया तरीका अपना लिया गया है। इस समिति में केवल प्रस्ताव पारित करवाकर प्रभार थमाया जा रहा है, ताकि व्यवस्थापक पद पर काबिज होकर सेवानिवृत्ति के समय सभी परिलाभों (Retirement Benefits) का भुगतान लिया जा सके और हर महीने मनमाना वेतनमान (Pay Scale) निर्धारित कराया जा सके। विभागीय अनुभाग की साठगांठ से ऐसे कार्मिकों को नियमों के विरुद्ध पूर्णकालिक व्यवस्थापक पद थमाए जा रहे हैं।हालांकि, जिला स्तरीय सहकारिता विभाग उप रजिस्ट्रार (Deputy Registrar) सहकारी समितियां कार्यालय ने लिखित रूप से यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके कार्यक्षेत्र स्तर पर ऐसी किसी पैक्स समिति में कार्यरत कार्मिक की सेवा हस्तांतरण या वेतनमान लागू करने के प्रस्तावों की पुष्टि नहीं की गई है। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर इन नियम विरुद्ध नियुक्तियों पर विभाग आंखें मूंदे बैठा है। वर्ष 2017 के बाद पैक्स में नई नियुक्तियों पर रोक के आदेशों की अवहेलना कर खड़ा किया गया यह अकुशल तंत्र वर्तमान में सीसीबी बैंक (CCB Bank) के लगभग 110 करोड़ रुपए के कर्ज को अवधिपार (Overdue) करवा चुका है।


