सार
सहकारिता विभाग द्वारा एसटी सेक्टर की बदहाली के जिम्मेदार सेवानिवृत्त अधिकारी को पुनः सलाहकार बनाने पर भारी रोष है,FIG पोर्टल नीति से चरमराया साख ढाँचा, विभाग ने उसी अफसर को सौंपी सलाहकार की कमान।
विस्तार 
जयपुर/जोधपुर | प्रदेश डेस्क रिपोर्टर | 10 अक्टूबर |प्रदेश में सहकारी साख (Cooperative Credit) के त्रिस्तरीय ढांचागत तंत्र (Three-tier Structural System) को बदहाली के कगार पर पहुँचाने वाले एक सेवानिवृत्त अधिकारी को विभाग ने सेवानिवृत्ति के पश्चात् पुनः ‘सलाहकार’ (Advisor) के रूप में नियुक्त कर दिया है। विभागीय हलकों, कर्मचारी यूनियनों और सहकारिता चिंतकों में इस विवादित पुनर्नियुक्ति को लेकर भारी रोष व्याप्त है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, सहकारिता विभाग (Cooperative Department) के संयुक्त शासन सचिव (Joint Secretary) प्रहलाद सहाय नागा द्वारा सेवानिवृत्त अतिरिक्त रजिस्ट्रार (Retired Additional Registrar ) इंदर सिंह को विभाग में सलाहकार पद पर नियुक्त करने का आदेश जारी किया गया है। सहकारिता विशेषज्ञों का कहना है कि इसी अधिकारी ने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी त्रुटिपूर्ण नीतियाँ बनाई थीं, जिनके कारण आज प्रदेश भर का अल्पकालीन साख (Short-Term Credit / ST Sector) ढाँचा बुरी तरह चरमरा गया है।सहकारिता से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के विवादास्पद निर्णयों से विभाग की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। एक ओर जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को संबल देने वाले प्राथमिक साख ढाँचे को वित्तीय संकट से उबारने की सख्त आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय संकट के जिम्मेदार पूर्व अधिकारियों को पुनः प्रभावशाली पदों पर बिठाना पूरी व्यवस्था के प्रति आमजन के विश्वास को तोड़ रहा है। सहकारिता प्रेमियों ने राज्य सरकार से इस पुनर्नियुक्ति को तत्काल निरस्त करने तथा पूरे प्रकरण की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जाँच कराने की माँग की है।
एफआईजी (FIG) पोर्टल का छलावा: बदहाली की कगार पर सीसीबी (CCB) और पैक्स (PACS)
राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (Apex Bank) में प्रबंध निदेशक (Managing Director ) पद पर रहते हुए इंदर सिंह द्वारा लागू की गई ‘एफआईजी (FIG ) पोर्टल ऑनलाइन पंजीकरण नीति’ आज पूरे सहकारी त्रिस्तरीय ढाँचागत क्षेत्र के लिए नासूर बन चुकी है। इस पोर्टल को लागू करने के नाम पर अनुमानित करोड़ों रुपये की राशि पानी की तरह बहा दी गई, किंतु धरातल पर परिणाम शून्य रहे।इस गलत नीति के कारण आज राजस्थान के अधिकांश केंद्रीय सहकारी बैंकों ( CCB) का अपना ‘आरक्षित कोष’ (Reserve Fund) कालातीत ऋणों (Overdue Loans) के रूप में फँसकर रह गया है। नतीजतन, सीसीबी (CCB), पैक्स( PACS) और लैंप्स ( LAMPS) वित्तीय संकट के कारण अब परिसमापन/समापन (Liquidation) की ओर बढ़ने लगे हैं। विभागीय बैठकों में वसूली के जो आँकड़े प्रस्तुत किए जा रहे हैं, वे वास्तव में ‘नया-पुराना’ ऋण नवीनीकरण (Loan Renewal) का एक अवैधानिक तंत्र मात्र हैं।
जोधपुर खंड की विवादित स्क्रीनिंग जाँच और कटघरे में अधिकारी
जिस समय राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (Apex Bank) में विवादित नीतियाँ बनाई जा रही थीं, उस दौरान रजिस्ट्रार कार्यालय (Registrar Office) के बैंकिंग अनुभाग (Banking Section) में अतिरिक्त रजिस्ट्रार (Additional Registrar) पद पर भोमाराम तैनात थे। बाद में उनकी नियुक्ति जोधपुर खंड (Jodhpur Division) में अतिरिक्त रजिस्ट्रार के रूप में हुई, जहाँ की बहुचर्चित और फर्जीवाड़े का पर्याय बनी ‘स्क्रीनिंग चयन प्रक्रिया’ (Screening Selection Process) की जाँचें आज भी लंबित हैं।दूसरी ओर, पूरे प्रदेश में इस विवादित स्क्रीनिंग प्रक्रिया की जाँच पर राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा दिए गए स्थगनादेश (Stay Order) को हटवाने के लिए राज्य सरकार अब खंडपीठ ( DB) में गई है। सहकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रबुद्ध जनों का कहना है कि इस पूरे तंत्र में मुख्य भूमिका निभाने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली की गहन जाँच होनी चाहिए।


