सार
राजस्थान उच्च न्यायालय ने ग्राम सेवा सहकारी समिति के व्यवस्थापक के मनमाने और नियम विरुद्ध निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए राज्य सरकार व अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।
विस्तार
जोधपुर | Legal Report 9 अक्टूबर |सहकारिता क्षेत्र से जुड़े एक अहम कानूनी मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए ग्राम सेवा सहकारी समिति लिमिटेड, डंडाली (Dandali) के व्यवस्थापक (Manager) के निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश पारित किया है तथा राज्य सरकार, जिला कलेक्टर बालोतरा (District Collector Balotra), बाड़मेर केंद्रीय सहकारी बैंक (Barmer Central Cooperative Bank) और संबंधित सहकारी समिति के अध्यक्ष (President) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
प्रकरण के अनुसार, मानसिंह पुत्र पूनम सिंह, निवासी उपरला बास, डंडाली ने अधिवक्ता (Advocate) सी.एस. कोठवानी और चिन्मय शेखर कोठवानी के माध्यम से उच्च न्यायालय में सिविल रिट याचिका (Civil Writ Petition) दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से न्यायालय में यह दलील दी गई कि PACS/LAMPS सेवा नियम, 2022 के नियम 42 के प्रावधानों के तहत किसी भी प्रबंधक को केवल संचालक बोर्ड (Managing Board) की औपचारिक अनुशंसा पर ही संबंधित ग्राम सेवा समिति के अध्यक्ष द्वारा निलंबित किया जा सकता है। परंतु, वर्तमान प्रकरण में संचालक बोर्ड की किसी भी प्रकार की पूर्व संस्तुति या अनुशंसा के बिना ही अध्यक्ष ने बालोतरा जिला कलेक्टर के मौखिक निर्देशों के प्रभाव में आकर मनमाने ढंग से दंडात्मक कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया था, जो कि पूर्णतः विधि विरुद्ध (Against the Law) है।
न्यायालय ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद यह माना कि यह प्रकरण गहन विचारणीय एवं न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के योग्य है। इसके मद्देनजर अदालत ने अंतरिम राहत प्रदान करते हुए गत 31 अगस्त 2026 को ग्राम सेवा सहकारी समिति लिमिटेड, डंडाली (पंचायत समिति सिणधरी, जिला बालोतरा) के अध्यक्ष द्वारा दिए गए निलंबन आदेश के क्रियान्वयन पर आगामी सुनवाई की तिथि तक पूर्ण रोक लगा दी है। इस न्यायिक हस्तक्षेप से सहकारिता महकमे और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर हड़कंप मच गया है, क्योंकि नियम विरुद्ध निलंबन के मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वैधानिक प्रक्रिया (Statutory Procedure) का पालन करना अनिवार्य है।
वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी बनी आधार
सहकारिता जगत में प्रशासनिक मनमानी और नियमों के उल्लंघन का यह पहला मामला नहीं है, किंतु इस न्यायिक हस्तक्षेप ने निचले स्तर की संस्थाओं में प्रबंधकों के अधिकारों और सेवा नियमों की महत्ता को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। उच्च न्यायालय द्वारा पारित इस अंतरिम आदेश के बाद ग्रामीण अंचल की सहकारी समितियों के संचालन और शासी निकायों (Governing Bodies) के अधिकारों पर एक नई विधिक बहस छिड़ गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि पैक्स (PACS) और लैम्प्स (LAMPS) के सेवा नियमों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए संचालक बोर्ड की संस्तुति अनिवार्य शर्त है, ताकि राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में आकर किसी भी कर्मचारी (Employee) के खिलाफ अनुचित कार्रवाई न की जा सके। इस कानूनी लड़ाई के आगामी चरणों में सहकारिता विभाग के उच्चाधिकारियों को भी अपने दिशा-निर्देशों और विधिक प्रावधानों की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। अदालत के इस फैसले से सहकारी आंदोलन की सबसे छोटी और मजबूत इकाई पैक्स-लैम्प्स के कर्मचारियों में न्याय की आस जगी है तथा यह प्रकरण आने वाले दिनों में प्रशासनिक हलकों में एक नजीर (Precedent) बन सकता है।


