Home जयपुर हठधर्मी की पराकाष्ठा: 10 अप्रैल बीती, पर नहीं बढ़ी ऋण चुकाने की तिथि

हठधर्मी की पराकाष्ठा: 10 अप्रैल बीती, पर नहीं बढ़ी ऋण चुकाने की तिथि

सार 

Jaipur : राजस्थान में वित्त विभाग की हठधर्मी के कारण ऋण चुकाने की मोहलत फाइल में अटकी…. ब्याज अनुदान के अभाव में सीसीबी और पैक्स संस्थाएं कंगाल हो रही हैं, जिससे कृषि ढांचा चरमरा गया है।

विस्तार 

जयपुर। 10 अप्रैल | डिजिटल डेस्क | राजस्थान के सहकारी ढांचे की सीसीबी और पैक्स-लैम्पस में इन दिनों ‘बजट’ और ‘नीयत’ के बीच वैसी ही जंग चल रही है, जैसी एक प्यासे और मृगतृष्णा के बीच होती है। प्रदेश का किसान ओलावृष्टि से दबे पांव घर लौट रहा है और अनावृष्टि के थपेड़े झेल रहा है, लेकिन वित्त विभाग के ‘बाबू’ और ‘साहब’ फाइलों की गुदगुदी में इतने मगन हैं कि उन्हें बाहर का मौसम नजर ही नहीं आ रहा | ​सहकारिता विभाग ने बड़ी उम्मीद से फाइल भेजी थी कि किसानों को 30 जून तक ऋण चुकाने की मोहलत दे दी जाए। लेकिन वित्त विभाग ने परंपरा को बरकरार रखते हुए उस पर ‘कुंडली’ मार ली है। मार्च बीत गया, अप्रैल के भी दस दिन निकल गए, लेकिन वित्त विभाग की ‘हठधर्मी’ का किला ढहने का नाम नहीं ले रहा। ऐसा लगता है जैसे तिथी बढ़ाना इनके लिए कोई खैरात बांटना हो ​| सरकार ढोल पीटती है ‘ब्याज मुक्त ऋण’ का, लेकिन असलियत यह है कि यह योजना अब केवल एक सरकारी झुनझुना बनकर रह गई है, वित्त विभाग ने ब्याज अनुदान और कर्ज माफी के विलंब भुगतान पर देय 8 प्रतिशत की ब्याज राशि पर ऐसी ‘ब्रेक’ लगाई है कि आरबीआई के नियमों की मार से प्रदेश की अधिकांश सीसीबी संचित हानि के दलदल में डूब रही हैं दूसरी तरफ सरकार से मिलने वाली 4% ब्याज की राशि क्या अटकी, पैक्स (PACS) और लैम्पस (LAMPS) पूरी तरह कंगाल हो गईं। हालत यह है कि इन संस्थाओं के पास उधारकर्ता को देने के लिए धेला तक नहीं बचा है। ​पिछले एक महीने से पैक्स-लैम्पस कार्मिक कार्य बहिष्कार कर रहे हैं, लेकिन सरकार के बंद कमरों में बैठे ‘साहबों’ के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

लोकलुभावन योजनाओं के खिलाफ ‘रिट याचिका’ की तैयारी

सहकारी आंदोलन से जुड़े प्रबुद्ध लोगों ने अब सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का मन बना लिया है। जानकारों का कहना है कि यह लड़ाई योजनाओं को बंद करने के लिए नहीं, बल्कि सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता बचाने के लिए है। एक ठोस रिट याचिका के जरिए उस FIG पोर्टल व्यवस्था, जिसने तकनीकी एकाधिकार के नाम पर पैक्स (PACS) और जिला सहकारी बैंकों (CCB) के अधिकार छीन लिए हैं। 90 के दशक की ‘कैडर अथॉरिटी’ की तरह ही, अब इस केंद्रीकृत पोर्टल नीति को कठघरे में खड़ा कर सहकारी ढांचे के विकेंद्रीकरण को बहाल करने की मांग उठ रही है।

प्रकाश वैष्णव 25 सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं । सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र जय सत्यपुर से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत कर लोक सूचना एवं क्षेत्र का साथी समाचार पत्र में सेवा दी । उसके बाद पिछले कई सालों से मारवाड़ का मित्र हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र का संचालन निरंतर कर रहें हैं ।

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