सारांश
जालोर पंचायती राज चुनाव (Panchayat Raj Elections) में कांग्रेस 1 दशक (10 years) का सूखा खत्म करने व भाजपा गढ़ बचाने में जुटी है। अकाल, खाद किल्लत और किसानों (Farmers) के असंतोष के बीच 25 नवंबर को जिला प्रमुख (District Pramukh) का फैसला होगा।
विस्तृत 
जालोर | चुनावी डेस्क, 24 अक्टूबर |जालोर जिले में पंचायती राज चुनावों की घोषणा के साथ ही ग्रामीण राजनीति का पारा चरम पर पहुंच चुका है। जिले की 14 पंचायत समितियों की 433 ग्राम पंचायतों में चुनावी बिसात बिछ गई है। जिला परिषद सदस्यों की लोक सूचना के बाद, 19 अक्टूबर को नाम वापसी और सिंबल (प्रतीक चिह्न) आवंटन के साथ ही चुनावी मुकाबला पूरी तरह साफ हो चुका है।इस बार सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक दशक (10 साल) के सूखे के बाद कांग्रेस अपनी वापसी दर्ज करा पाएगी या सत्तारूढ़ दल (भाजपा) फिर से अपना कब्जा बरकरार रखेगा? गौरतलब है कि वर्ष 2010 में कांग्रेस की श्रीमती जसवंत कंवर के जिला प्रमुख बनने के बाद से, वर्ष 2015 में भाजपा के डॉ. वन्नेसिंह गोहिल और वर्ष 2021 में भाजपा के ही राजेश कुमार राणा जिला प्रमुख चुने गए थे।
बदहाल सहकारी आंदोलन और खाद की किल्लत से जूझ रहा ग्रामीण अंचल
जिले के ग्रामीण आंचल में सहकारी आंदोलन,मे सहकारी संस्थाए जो कभी किसानों के लिए सबसे पुरानी और भरोसेमंद वित्तीय उधार व मदद की सेवा हुआ करती थी, आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। चुनाव के इस माहौल में जिले की सहकारी संस्थाएं और प्राथमिक समितियां खाद की भारी किल्लत से जूझ रही हैं, जिससे किसानों को समय पर यूरिया और डीएपी नहीं मिल पा रही है।इसके साथ ही, जिले की फसली सहकारी ऋण व्यवस्था आज मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी है, जिससे किसानों को अपनी कृषि जरूरतों के लिए भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद की स्थिति यह है कि कभी-कभार ही इसकी शुरुआत होती है और वह भी नाममात्र की खरीद तक सीमित रह जाती है। सहकारिता ढांचे की इस दुर्दशा और प्रशासनिक अनदेखी का सीधा असर पंचायती राज चुनावों में देखने को मिल सकता है
वर्तमान चुनावी परिदृश्य में सत्तारूढ़ दल के प्रति आमजन और किसानों में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।एक तरफ जहां पड़ोसी जिले बाड़मेर और बालोतरा में अकाल की मार से पशुधन को बचाने के लिए चारा डिपो खोलने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, वहीं जालोर में प्रशासन की सुस्ती से अब तक अकाल प्रभावित क्षेत्रों में चारा डिपो खोलने की कवायद शून्य के बराबर है। इसके अलावा, जवाई पुनरुद्धार का गूंजता मुद्दा, अतीत में हुआ किसान आंदोलन, सांचौर विधानसभा क्षेत्र में नहरी जल वितरण की विफलता, फसल बीमा क्लेम में अड़ंगे तथा वर्ष 2022 से बकाया रबी की कृषि आदान-अनुदान राशि ने किसानों का गुस्सा बढ़ा दिया है।इतना ही नहीं, हाल ही में जालोर नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस का सभापति बनना और सत्तारूढ़ दल द्वारा टिकट वितरण में अपनों की ही उपेक्षा करना भारी पड़ रहा है। झाब पंचायत समिति का मुद्दा भी राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। 25 नवंबर को जिला प्रमुख तथा 27 नवंबर को 14 पंचायत समितियों में प्रधान पद का चुनाव होना है। सत्ता की इस खींचतान में अब ऊंट किस करवट बैठता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

