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जालोर पंचायत समिति चुनाव: राजनीतिक सरगर्मी तेज, अकाल की मार और जवाई-आकोली नदी के अस्तित्व के बीच दांव पर दिग्गजों की प्रतिष्ठा

सार

जालोर पंचायत समिति चुनाव में 40 ग्राम पंचायतों के 23 वार्डों हेतु 29 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा। प्रधान पद सामान्य महिला हेतु आरक्षित है। अकाल की मार, पेयजल संकट और जवाई-आकोली नदी के अस्तित्व जैसे ज्वलंत मुद्दों के बीच दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। मतगणना 20 नवंबर को होगी।

विस्तार

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जालोर: |चुनावी डेस्क 20 अक्टूबर | जिले में पंचायतीराज चुनाव को लेकर ग्रामीण अंचलों में राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। जालोर पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाली 40 ग्राम पंचायतों में चुनावी पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। दूसरे चरण के तहत 29 अक्टूबर 2026 को मतदान होना है, जिसके लिए 19 अक्टूबर को नाम वापसी की अंतिम तिथि के बाद चुनाव प्रतीकों का आवंटन कर दिया गया है और चुनावी मैदान में डटे अभ्यर्थियों की अंतिम सूची का प्रकाशन भी हो चुका है। इस बार जालोर पंचायत समिति में कुल 23 वार्डों के लिए पंचायत समिति सदस्य चुने जाने हैं, जिसके लिए राजनीतिक दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी है। खास बात यह है कि इस बार प्रधान का पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है, जिससे राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं और हर दल में महिला चेहरों को लेकर मंथन तेज हो गया है।

जालोर पंचायत समिति के इतिहास पर नजर डालें तो यहाँ का राजनीतिक अतीत काफी समृद्ध और प्रभावशाली रहा है। वर्ष 1959 व 1961 के शुरुआती दौर में श्री मालमसिंह जालोर और श्री शंभूसिंह सामूजा ने प्रधान के रूप में बागडोर संभाली थी, जिनमें से मालमसिंह बाद में जिला प्रमुख भी चुने गए। इसके बाद के दशकों में श्री मोतीसिंह भागली सिंधलान (1965), श्री गणपतसिंह सियाणा (1981 व 1985, जो आगे चलकर जिला प्रमुख बने), श्री कल्याणसिंह सांथू (1985 उपचुनाव), श्री विजयसिंह सामूजा (1988 उपचुनाव), श्री प्रदीपसिंह सियाणा (1995), श्री पदमाराम सियाणा (2000), श्रीमती राजू सांखला जालोर (2005) और श्रीमती हेमंत कंवर सियाणा (2010) ने इस पद को सुशोभित किया। वहीं आधुनिक दौर में वर्ष 2015 में श्रीमती संतोष कुमारी और वर्ष 2020 में नारायण सिंह इस पद पर निर्वाचित हुए। इन तमाम दिग्गजों के कार्यकाल के बाद अब वर्तमान चुनाव में महिला आरक्षण ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।

चुनावी मैदान के इन कड़े समीकरणों के बीच इस बार का ग्रामीण चुनाव कई गंभीर और ज्वलंत मुद्दों के साये में हो रहा है। इस वर्ष क्षेत्र का एक बड़ा भूभाग अकाल की चपेट में है, जिससे किसानों और पशुपालकों के सामने आजीविका का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा, इस पंचायत समिति क्षेत्र की जीवनरेखा कही जाने वाली जवाई और आकोली नदी का भौगोलिक स्वरूप और ऐतिहासिक अस्तित्व भी इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बन गया है। इन दोनों नदियों के सिकुड़ते पाट, जल संरक्षण की कमी और भू-जल स्तर में गिरावट ने ग्रामीण इलाकों में सिंचाई और पेयजल की विकराल समस्या पैदा कर दी है। जनता इस बार ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो अकाल से राहत दिलाने के साथ-साथ इन जल स्रोतों के पुनरुद्धार और क्षेत्र के समग्र विकास के लिए ठोस कार्ययोजना पेश कर सके। निर्वाचन विभाग के अनुसार, मतदान के बाद 20 नवंबर 2026 को जिला मुख्यालय पर प्रातः 8 बजे से मतगणना शुरू होगी जो कार्य समाप्ति तक चलेगी, जबकि प्रधान का चुनाव 27 नवंबर और उप प्रधान का चुनाव 28 नवंबर 2026 को संपन्न होगा।

 अकाल की मार और पेयजल संकट के बीच सियासी दलों की अग्निपरीक्षा

जालोर पंचायत समिति क्षेत्र में इस बार का पंचायतीराज चुनाव महज राजनीतिक सरगर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहाँ के आम जनजीवन के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। इस वर्ष क्षेत्र का एक बड़ा भूभाग गंभीर अकाल की चपेट में आ गया है, जिससे खरीफ की फसलें पूरी तरह चौपट हो चुकी हैं और गांवों में मवेशियों के लिए चारे-पानी का संकट गहराता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर छिनने से पलायन की समस्या भी सिर उठाने लगी है। ऐसे में चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों के लिए अकाल राहत और सूखा प्रबंधन सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बन गया है। मतदाताओं का मूड इस बार पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है और वे पारंपरिक वादों से आगे बढ़कर स्थायी समाधान चाहने वाले जनप्रतिनिधियों को तरजीह देने का मन बना चुके हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव इस बात की भी अग्निपरीक्षा है कि वे इस आपदा के समय जनता के बीच कितना विश्वास जगा पाते हैं। महिला आरक्षण के चलते इस बार महिला नेतृत्व के कंधों पर इस गंभीर चुनौती से निपटने की बड़ी जिम्मेदारी आने वाली है, जिससे चुनावी सरगर्मी और अधिक तेज हो गई है।

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 जवाई और आकोली नदी का अस्तित्व और बदलता भौगोलिक स्वरूप बना चुनावी मुद्दा

जालोर पंचायत समिति क्षेत्र के इतिहास और भूगोल को संवारने में जवाई और आकोली नदी की ऐतिहासिक भूमिका रही है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में इनका अस्तित्व खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। इन दोनों नदियों के भौगोलिक स्वरूप में आए बदलाव, अवैध खनन और जल बहाव क्षेत्रों में हो रहे अतिक्रमण के कारण आज पूरा क्षेत्र भू-जल संकट से जूझ रहा है। कभी इन नदियों के पानी से समृद्ध रहने वाले इस इलाके में आज पेयजल और सिंचाई के लिए हाहाकार मचा हुआ है। पंचायत समिति चुनाव के इस माहौल में ग्रामीण इलाकों के मतदाता इन जल स्रोतों के संरक्षण और पुनरुद्धार को लेकर राजनीतिक दलों से कड़े सवाल पूछ रहे हैं। अतीत में श्री मालमसिंह से लेकर हालिया कार्यकाल तक यहाँ कई दिग्गज प्रधान रहे हैं, लेकिन जवाई और आकोली नदियों के दिन बहुरने की उम्मीद आज भी पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पाई है। आगामी 29 अक्टूबर को होने वाले मतदान से पहले हर वार्ड और हर ग्राम पंचायत में नदी-नालों का सौंदर्यीकरण और जल संरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन चुका है, जो प्रत्याशियों की हार-जीत तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

परिचय : प्रकाश वैष्णव एक सहकारी चिंतक, विश्लेषक, स्तंभकार और पत्रकार हैं।
​पत्रकारिता अनुभव: वे पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
​करियर की शुरुआत: उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘जय सत्यपुर’ से की थी।
​अन्य सेवाएँ: इसके बाद उन्होंने ‘लोक सूचना’ एवं ‘क्षेत्र का साथी’ समाचार पत्रों में भी अपनी सेवाएँ दीं।
​वर्तमान दायित्व: वर्तमान में वे सहकारी आंदोलन को समर्पित प्रमुख हिंदी पाक्षिक समाचार पत्र ‘मारवाड़ का मित्र’ और ‘MKM MEDIA’ समूह वेब पोर्टल के चीफ एडिटर के रूप में निरंतर संचालन कर रहे हैं।

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